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भगत सिंह पर निबंध (Bhagat Singh Essay in Hindi)

क्रांतिवीरों की जब भी बात होगी उस श्रेणी में भगत सिंह का नाम सबसे ऊपर होगा। गुलाम देश की आज़ादी के लिए अपनी जवानी तथा सम्पूर्ण जीवन भगत सिंह ने देश के नाम लिख दिया। सदियों में ऐसा एक वीर पुरुष जन्म लेकर धरती को कृतार्थ करता है। देश भक्ति के भाव से ओत-प्रोत शहीद भगत सिंह का जन्म पंजाब के जिला लायलपुर गांव बंगा (वर्तमान पाकिस्तान) में, 28 सितम्बर 1907 को एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह तथा माता का नाम विद्यावती कौर था। परिवार के आचरण का अनुकूल प्रभाव सरदार भगत सिंह पर पड़ा।

भगत सिंह पर छोटे-बड़े निबंध (Short and Long Essay on Bhagat Singh in Hindi, Bhagat Singh par Nibandh Hindi mein)

भगत सिंह पर निबंध – 1 (250 – 300 शब्द).

कहते हैं ‘पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं’ भगत सिंह के बचपन के कारनामों को देख कर लोगों को यह प्रतीत होने लगा था की वह वीर, धीर और निर्भीक हैं। भगत सिंह के जन्म के समय पर उनके पिता “सरदार किशन सिंह” व उनके दोनों चाचा “सरदार अजित सिंह” तथा “सरदार स्वर्ण सिंह” ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ होने के वजह से जेल में बंद थे।

भगत सिंह की शिक्षा दीक्षा

भगत सिंह का जन्म वर्तमान पाकिस्तान के लायलपुर, बंगा गांव में हुआ था। उनका परिवार स्वामी दयानंद के विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित था। भगत सिंह की प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल में हुई। प्राथमिक शिक्षा के पूर्ण होने के पश्चात 1916-17 में उनका दाखिला लाहौर के डीएवी स्कूल में करा दिया गया। भगतसिंह का संबंध देशभक्त परिवार से था वह शूरवीरों की कहानियां सुन कर बड़े हुए थे।

आजादी के लिए संघर्ष और शहादत

विद्यालय में उनका संपर्क लाला लाजपत राय तथा अंबा प्रसाद जैसे क्रांतिवीरों सें हुआ। उनकी संगति में भगत सिंह के अंदर की शांत ज्वालामुखी सक्रिय अवस्था में आ रही थी और इन सब के मध्य 1920 में हो रहे गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन ने भगत सिंह में देशभक्ति को चरम पर पहुँचा दिया। 13 अप्रैल 1919, पंजाब में स्वर्ण मंदिर के समीप जलियांवाला बाग नामक स्थान पर बैसाखी के दिन जनरल डायर(ब्रिटिश ऑफिसर) द्वारा अंधाधुन गोलियां चला कर हजारों लोगों की हत्या कर दी गई तथा अनेक लोगों को घायल कर दिया गया। इस घटना का भगत सिंह पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा एवं यही घटना ही भारत में ब्रिटिश सरकार के पतन की शुरुआत का कारण बना। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह और उनके दोनों साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई।

23 वर्षीय नौजवान भगत सिंह ने जीते जी तथा मरने के बाद भी अपना सब कुछ देश के नाम कर दिया। उनकी जीवनी पढ़ते समय लोगों में जोश का उत्पन्न होना उनके साहस के चरम को दर्शाता है। भगत सिंह के बलिदान और त्याग को पहचान कर हमें उनसे सीख लेते हुए देश की प्रगति में योगदान देना चाहिए।

इसे यूट्यूब पर देखें : भगत सिंह

भगत सिंह पर निबंध – 2 (400 शब्द)

निःसंदेह भगत सिंह का नाम भारत के क्रांतिकारियों के सूची में उच्च शिखर पर विद्यमान है। उन्होंने केवल जीवित रहते ही नहीं अपितु शहीद होने के बाद भी देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया तथा अपने शौर्य से अनेक नौजवानों को देश भक्ति के लिए प्रेरित किया है।

भगत सिंह को लोग क्यों साम्यवाद तथा नास्तिक कहने लगे ?

भगत सिंह उन युवाओं में शामिल थे जो देश की आज़ादी के लिए गांधीवाद विचारधारा में नहीं बल्कि लाल, बाल, पाल के पद चिन्हों पर चलने में विश्वास रखते थे। उन्होंने उन लोगों से हाथ मिलाया जो आज़ादी हेतु अहिंसा का नहीं बल्कि ताकत का प्रयोग करते थे। इस वजह से लोग उन्हें साम्यवाद, नास्तिक तथा समाजवादी कहने लगे।

प्रमुख संगठन जिनसे भगत सिंह जुड़े

सर्वप्रथम भगत सिंह ने अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की। तत्पश्चात राम प्रसाद बिस्मिल के फांसी से वह इतने क्रोधित हुए की चद्रशेखर आजाद के साथ मिल कर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए।

लाला लाजपत राय के मृत्यु का प्रतिशोध

साइमन कमीशन के भारत आने के वजह से पूरे देश में विरोध प्रदर्शन प्रारंभ हो चुका था। 30 अक्टूबर 1928 के दिन एक दुखद घटना घटित हुई जिसमें लाला लाजपत राय के नेतृत्व में साइमन कमीशन के खिलाफ विरोध कर रहें युवाओं तथा लाला लाजपत राय की लाठी से पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। उन्होंने अपने अंतिम समय में भाषण में कहा था- “मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक चोट ब्रिटिश साम्राज्य के कफ़न की कील बनेगी” और ऐसा ही हुआ। इस दुर्घटना से भगत सिंह को इतना आहात पहुंचा की उन्होंने चद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर लाला लाजपत राय के मृत्यु के ठीक एक महिने बाद ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया।

केंद्रीय असेंबली में बम फेंकना

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश सरकार के क्रूरता का बदला केंद्रीय असेम्बली पर बम फेंक कर लिया तथा गिरफ़्तारी के बाद गांधी जी समेत अन्य लोगों के अनेक आग्रह करने पर भी उन्होंने मांफी मांगने से इनकार कर दिया। 6 जून 1929 दिल्ली के सेशन जज लियोनॉर्ड मिडिल्टन के अदालत में भगत सिंह ने अपना ऐतिहासिक बयान दिया और उन्हें राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फांसी की सजा सुनाई गई।

भगत सिंह के साहस का अनुमान हम उनके आखरी बयान से लगा सकते हैं जिसमें उन्होंने साफ तौर पर केंद्रीय असेंबली पर बम फेंकने की बात को कबूला और उन्होंने ऐसा क्यों किया यह सरेआम सबके समक्ष, लोगों के भीतर की ज्वाला को जगाने के लिए बताया।

Bhagat Singh par Nibandh– 3 (500 शब्द)

भगत सिंह वीर क्रांतिकारी के साथ-साथ एक अच्छे पाठक, वक्ता तथा लेखक भी थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ- ‘एक शहीद की जेल नोटबुक’, ‘सरदार भगत सिंह’, ‘पत्र और दस्तावेज़’, ‘भगत सिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज’ तथा बहुचर्चित रचना ‘द पीपल में प्रकाशित होने वाला लेख – मैं नास्तिक क्यों हूँ’ हैं।

भगत सिंह की बहुचर्चित लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ”

27 सितम्बर 1931 में द पीपल नामक अखबार में शहीद भगत सिंह का ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ लेख प्रकाशित हुआ। समाजिक कुरीति, समस्या तथा मासूम लोगों के शोषण से दुखी होकर इस लेख के माध्यम से उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व पर तर्कपूर्ण सवाल खड़े किए। यह लेख उनके प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है।

शहीद भगत सिंह के पत्र

“उन्हें यह फ़िक्र है हरदम,

नयी तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है?

हमें यह शौक है देखें,

सितम की इम्तहा क्या है?”

शहीद भगत सिंह ने जेल से अपने छोटे भाई कुलतार सिंह के नाम एक ख़त लिखा उसमें इस कविता की चार लाइन लिखी। यह कविता उनकी रचना नहीं है पर उनके हृदय के करीब थी। उनके पत्र में ब्रिटिश सरकार के अतिरिक्त समाज में रंग, भाषा तथा क्षेत्र के अधार पर लोगों मे व्याप्त भेद-भाव के प्रति चिंता पाया जाता था।

भगत सिंह की फांसी रुकवाने के प्रयास

भगत सिंह को धारा 129, 302 तथा विस्फोट पदार्थ अधिनियम 4 और 6 एफ तथा अन्य कई धाराओं के तहत भारतीय दण्ड सहिंता के आधार पर राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फांसी की सजा सुनायी गई। उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय ने 14 फरवरी 1931 को वायसराय के समक्ष भगत सिंह के माफ़ी का आग्रह किया पर इस माफ़ीनामे पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। इसके बाद 17 फरवरी 1931 को गांधी जी ने भगत सिंह की माफ़ी के लिए वायसराय से मुलाकात की पर इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ। यह सब भगत सिंह के इच्छा के विरूद्ध हो रहा था, उनका कहना था “इन्कलाबियों को मरना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मज़बूत होता है, अदालत में अपिल से नहीं”।

भगत सिंह की फांसी तथा उनका दाह संस्कार

23 मार्च 1931 की शाम को भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को फांसी दे दी गई। कहा जाता है वह तीनों फांसी तक जाते समय ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गीत मस्ती में गाते हुए जा रहे थे। फांसी के वजह से लोग कहीं किसी प्रकार के आन्दोलन पर न उतर आए इसके भय से अंग्रेजों ने उनके शरीर के छोटे टुकड़े कर बोरियों में भर दूर ले जाकर मिट्टी के तेल से जला दिया। लोगों की भीड़ को आते देख अंग्रेजों ने उनकी लाश को सतलुज नदी में फेंक दिया। फिर लोगों ने उनके शरीर के टुकड़ों से उनकी पहचान कर उनका विधिवत दाह संस्कार किया।

यदि शहीद भगत सिंह को फांसी नहीं होती तो क्या होता ?

शहीद भगत सिंह के साथ बटुकेश्वर दत्त भी थे उन्हें काले पानी की सजा सुनायी गई थी। देश की आजादी के उपरांत उन्हें भी आज़ाद कर दिया गया पर उसके बाद क्या? उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने के सबूत मांगे गए और अंत में जाकर वह किसी सिगरेट की कम्पनी में सामान्य वेतन पर नौकरी करने लगे। फिर यह क्यों नहीं माना जा सकता है की भगत सिंह को यदि फांसी नहीं दी गई होती तो लोग उनका इतना सम्मान कभी न करते।

जिस वक्त शहीद भगत सिंह को फांसी दी गई तब वह सिर्फ 23 वर्ष के थे। उन्होंने स्वयं से पहले सदैव देश तथा देशवासियों को रखा। संभवतः इसीलिए उनके बलिदान के इतने वर्षों पश्चात भी वह हम सब में जीवित हैं।

Essay on Bhagat Singh

FAQs: भगत सिंह पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उत्तर. अप्रैल 1929 में भगत सिंह द्वारा दिया गया नारा ‘इंकलाब जिंदाबाद’ था।

उत्तर. भगत सिंह ने मार्च 1929 में भारतीय राष्ट्रवादी युवा संगठन की स्थापना की थी।

उत्तर. भगत सिंह के गुरु करतार सिंह सराभा थे और भगत सिंह हमेशा उनकी तस्वीर अपने साथ रखते थे।

उत्तर. भारत की संसद में भगत सिंह की प्रतिमा 2008 में स्थापित की गई थी।

उत्तर. 1954 में भगत सिंह पर बनी पहली फिल्म थी “शहीद-ए-आजाद भगत सिंह”।

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भगत सिंह पर निबंध (Bhagat Singh Essay in Hindi) - 100, 200, 500 शब्दों में

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भगत सिंह पर निबंध: शहीद-ए-आजम भगत सिंह का नाम युवाओं में आज भी जोश भर देता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह ऐसे क्रांतिकारी युवा थे जिन्होंने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में न सिर्फ अपने प्राणों की आहुती दी बल्कि देश के युवाओं को वतन के लिए कुर्बान होने का जज्बा दे गए। भगत सिंह जैसे सपूतों के कारण ही आज हम आजाद भारत में सांस ले पा रहे हैं। शहीद भगत सिंह महज 23 साल की उम्र में देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। हिंदी में पत्र लेखन सीखें ।

भगत सिंह पर निबंध (Bhagat Singh Essay in Hindi) - 100, 200, 500 शब्दों में

भगत सिंह एक युवा क्रांतिकारी थे जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया। देश के स्वतंत्रता संग्राम को एक नया मोड़ भगत सिंह की विचारधारा से मिला। शहीद भगत सिंह ही ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सबसे पहले पूर्ण स्वराज्य की मांग की थी। भगत सिंह पर हिंदी निबंध (Bhagat Singh Essay in Hindi) से उनके जीवन को बेहतर ढंग समझने में मदद मिलेगी।

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  • गुरु नानक जयंती पर निबंध
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स्वतंत्रता आंदोलनन के दौरान 1920 के दशक में हमारे देश के नेता अधिराज्य (Dominion status) की मांग करते थे। भगत सिंह कार्ल मार्क्स से बहुत अधिक प्रभावित थे तथा वे चाहते थे कि सभी को समानता का अधिकार प्राप्त हो। उन्होने ऐसी स्वतंत्र सुबह का सपना देखा था जिसमें सभी को समान अधिकार प्राप्त हो। भगत सिंह जी करतार सिंह सराभा तथा लाला लाजपत राय से भी बहुत अधिक प्रभावित थे। देश के लिए उनकी भक्ति, आस्था तथा समर्पण निर्विवाद है। यहां भगत सिंह पर कुछ निबंध दिए गए हैं।

भगत सिंह पर निबंध (Bhagat Singh par nibandh) : भगत सिंह पर निबंध 100 शब्दों (100 Words Essay On Bhagat Singh)

भगत सिंह भारत के सबसे उल्लेखनीय तथा प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने एक समाजवादी क्रांतिकारी के रूप में वीरतापूर्वक भारत की स्वतंत्रता के लिए कड़ा संघर्ष किया। सितंबर 1907 में पंजाब के शहर बंगा में एक सिख परिवार में जन्मे भगत सिंह के मां का नाम विद्यावती था और उनके पिता का नाम किशन सिंह था। उनके परिवार के कुछ सदस्यों ने महाराजा रणजीत सिंह की सेना में सेवा की, जबकि अन्य भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख सदस्य थे। वे स्वदेशी आंदोलन के प्रबल समर्थक थे। अहिंसा में भगत सिंह का विश्वास समय के साथ फीका पड़ गया और उनका मानना था कि केवल सशस्त्र विद्रोह ही स्वतंत्रता प्रदान कर सकता है। वह बहुत कम उम्र में आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए थे।

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भगत सिंह पर 200 शब्दों का निबंध (200 Words Essay On Bhagat Singh)

भगत सिंह पर निबंध (bhagat singh par nibandh)

भगत सिंह को सबसे महत्वपूर्ण समाजवादी क्रांतिकारियों में से एक माना जाता है। सिंह के दादा ने लाहौर में खालसा हाई स्कूल में भाग लेने के सिंह के आवेदन को अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति उनकी भक्ति से असहमत थे। आर्य समाज संस्थान में शिक्षा प्राप्त करने के परिणामस्वरूप भगत सिंह आर्य समाज सिद्धांत से बहुत प्रभावित थे। वह ब्रिटिश सरकार के खिलाफ किए गए दो हिंसक कृत्यों तथा बाद में उनकी मृत्यु के कारण प्रसिद्ध हुए।

भगत सिंह का बलिदान (Bhagat Singh’s Death)

भारतीय स्वायत्तता की जांच के लिए 1928 में ब्रिटिश सरकार द्वारा साइमन कमीशन की स्थापना की गई थी। हालाँकि, इस पैनल में एक भारतीय प्रतिनिधि की अनुपस्थिति के कारण, कई राजनीतिक संगठनों द्वारा इसका बहिष्कार किया गया था। लाला लाजपत राय ने एक जुलुस का नेतृत्व किया और स्थिति के विरोध के रूप में लाहौर स्टेशन की ओर मार्च किया। पुलिस ने लाठी चार्ज किया परिणामस्वरूप प्रदर्शनकारियों को बेरहमी से पीटा गया। लाला लाजपत राय को बुरी तरह घायल होने के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया और कुछ सप्ताह बाद उनकी मृत्यु हो गई। भगत सिंह इस घटना से बहुत क्रोधित हुए और प्रतिशोध लेने का फैसला किया। उन्होंने ब्रिटिश पुलिसकर्मी जॉन पी. सॉन्डर्स की हत्या कर दी और बाद में अपने सहयोगियों के साथ दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेका। भगत सिंह ने उस घटना में अपनी भूमिका को स्वीकार किया जब पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया। भगत सिंह ने मुकदमे के दौरान हुई जेल के दौरान भूख हड़ताल का नेतृत्व किया। 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह उनके साथियों राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी गई।

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भगत सिंह पर 500 शब्दों का निबंध (500 Words Essay On Bhagat Singh)

भगत सिंह, जिन्हें शहीद भगत सिंह के नाम से जाना जाता है, एक स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सुधार लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारियों में से एक कहा जाता है। वह अपने लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए समर्पित थे और उनकी दृष्टि स्पष्ट थी।

1912 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड से भगत सिंह बेहद परेशान थे। वह उस समय सिर्फ बारह वर्ष के थे, और इस घटना ने उसे स्थायी घाव दिया था। वह मिट्टी की एक बोतल लाए जो पीड़ितों के खून से सनी हुई थी, और वह उसकी पूजा करने लगे। समाजवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने राजनीतिक क्रांतियों का निर्माण किया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की हत्या थी। भगत सिंह अन्याय को बर्दाश्त नहीं कर सके और राय की मौत का बदला लेने की योजना बनाई। उसने ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या और सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली में बम फेकने की योजना बनाई।

भगत सिंह का बचपन

उनके जन्म के समय उनके परिवार ने भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में सक्रिय रूप से भाग लिया था। उनके चाचा सरदार अजीत सिंह और पिता सरदार किशन सिंह दोनों उस समय के प्रसिद्ध मुक्ति सेनानी थे। दोनों गांधीवादी दर्शन का समर्थन करने के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने लगातार लोगों को अंग्रेजों के विरोध में बड़ी संख्या में भाग लेने के लिए प्रेरित किया और इसलिए भगत सिंह भी इससे गहरे प्रभावित हुए। भगत सिंह का जन्म राष्ट्रीय देशभक्ति की भावना और देश को ब्रिटिश शासन से मुक्त करने के दृढ़ संकल्प के साथ हुआ था। उसके रक्त और शिराओं में देशभक्ति समाहित थी।

भगत सिंह की शिक्षा

जब महात्मा गांधी ने सरकार द्वारा समर्थित संस्थानों के बहिष्कार का आह्वान किया, तो भगत सिंह के पिता ने उनका समर्थन किया। इसलिए भगत सिंह ने 13 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया। लाहौर का नेशनल कॉलेज उनका अगला पड़ाव था। उन्होंने कॉलेज में यूरोपीय क्रांतिकारी आंदोलनों का अध्ययन किया और बहुत प्रभावित हुए।

भगत सिंह का देश के लिए योगदान

भगत सिंह ने यूरोप में राष्ट्रवादी आंदोलनों के बारे में बहुत सारे पत्र पढ़े। परिणामस्वरूप, 1925 में, वे उसी से बहुत प्रेरित हुए। अपने राष्ट्रीय आंदोलन के समर्थन में उन्होंने नौजवान भारत सभा की स्थापना की। बाद में, वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बन गए, जहाँ उनकी मुलाकात कुछ प्रसिद्ध क्रांतिकारियों से हुई, जिनमें चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु और सुखदेव शामिल थे।उन्होंने कीर्ति किसान पार्टी की पत्रिका के लिए भी लिखना शुरू किया। उस समय उनके माता-पिता चाहते थे कि वे शादी कर लें लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया क्योंकि उनका इरादा अपना पूरा जीवन स्वतंत्रता के संघर्ष को समर्पित करने का था। अनेक क्रांतिकारी कार्रवाइयों में भाग लेने के कारण वे ब्रिटिश पुलिस के लिए चुनौती बन गए थे। इस प्रकार पुलिस ने उन्हें मई 1927 में हिरासत में लिया। कुछ महीनों के बाद, उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया और उन्होंने एक बार फिर क्रांतिकारी समाचार पत्र लिखना शुरू कर दिया।

भगत सिंह एक महान देशभक्त थे। उन्होंने न केवल भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी, बल्कि वह इसे हासिल करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने को भी तैयार थे। उनके बलिदान ने पूरे देश को देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत कर दिया। समूचा देश इस शहीद का बेहद सम्मान करता है। वह हमेशा अमर शहीद भगत सिंह के नाम से भारतीयों के दिलों में जीवित रहेंगे।

उम्मीद करते हैं कि भगत सिंह पर निबंध (Bhagat Singh par nibandh) से उपयोगी जानकारी मिली होगी। यह जानकारी न केवल भगत सिंह जी और उनके जीवन को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगी बल्कि देशभक्ति की भावना जगाने के साथ ही अच्छा इंसान बनने में भी मददगार होगी।

Frequently Asked Question (FAQs)

भगत सिंह भारतीय इतिहास के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। उनका जन्म 27 सितंबर, 1907 को पंजाब के एक संधू जाट परिवार में हुआ था। 

शहीद भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर है।  

अमर शहीद भगत सिंह का पूरा नाम भगत सिंह संधू है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिकाओं के कारण अंग्रेज सरकार ने उनको खतरा माना और उन पर मुकदमा चलाया और फांसी की सजा सुनाई गई। 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह को सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरू को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई।

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भगत सिंह का इतिहास व जीवनी | Bhagat Singh Biography in Hindi

भगत सिंह (अंग्रेजी: Bhagat Singh; जन्म: 27 सितम्बर 1907, मृत्यु: 23 मार्च 1931) एक महान क्रांतिकारी नेता थे जिन्होंने सुखदेव व राजगुरु के साथ मिलकर जॉन सांडर्स नामक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या की। उन्होंने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त करवाने के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। 

भगत सिंह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन से जुड़ गए और संगठन के एक सक्रिय सदस्य बन गए। 23 साल की उम्र में भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को ब्रिटिश सरकार ने जॉन सांडर्स व एक भारतीय-ब्रिटिश सैनिक की हत्या का दोषी ठहराते हुए 23 मार्च 1931 को फांसी की सजा दी।

Table of Contents

भगत सिंह का परिचय (Introduction to Bhagat Singh)

भगत सिंह एक महान क्रांतिकारी थे जिनका जन्म 27 सितम्बर 1907 को पंजाब के बंगा नामक गांव (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता किशन सिंह संधु तथा माता विद्यावती थी। वह अपने पिता की दूसरी संतान थे। भगत सिंह के 3 भाई व 3 बहिनें थी। 

सिंह के पिता व चाचा अजीत सिंह भी राष्ट्र की स्वतंत्रता में सक्रिय थे। उनके कारण सिंह भी देशभक्ति के प्रति प्रेरित हुए। 

सिंह ने अपनी शुरुआत पढ़ाई अपने गांव बंगा से ही की और उसके बाद वे लाहौर के दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल में दाखिल हुए। 1923 में उन्होंने लाला लाजपत राय के द्वारा स्थापित लाहौर के नेशनल कॉलेज में प्रवेश लिया। इस कॉलेज ने छात्रों को ब्रिटिश सरकार के कॉलेजों व स्कूलों को त्यागने का मौका दिया। 

मई 1927 में ब्रिटिश पुलिस ने भगत सिंह को गिरफ्तार कर लिया। 60,000 रुपये की गारंटी पर उन्हें छोड़ा गया। उनकी गिरफ्तारी का कारण 1926 में लाहौर की बोंब घटना बताई गई। 

यह भी पढ़ें: भगत सिंह के अनमोल वचन

जॉन सांडर्स की हत्या में भागीदारी (Contribution in the killing of John Saunders)

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख कार्यकर्ता लाला लाजपत राय को पूरे भारत में पंजाब केसरी के नाम से जाना जाता था। 

राय व उनके क्रांतिकारियों ने साइमन कमीशन गो-बैक के नारे लगाए जिसके बाद जेम्स स्कोट नाम के अंग्रेज अधिकारी ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करने का आदेश दिया। इस लाठीचार्ज में पुलिस ने लाला लाजपत राय पर व्यक्तिगत हमले किये। पुलिस के द्वारा किए गए हमलों से 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय की हृदयाघात के कारण मृत्यु हो गई थी।

लाला लाजपत राय की मृत्यु होने से क्रांतिकारियों में रोष फैल चुका था और उन्होंने उनकी मृत्यु का बदला लेने की ठान ली। 

चंद्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन संगठन का नाम बदलकर के हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन कर दिया था। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने की सौगंध ली।

भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए, 17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश सरकार के पुलिस अधिकारी जॉन सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी।

चानन सिंह की हत्या (Killing of Channan Singh)

जॉन सांडर्स की हत्या करने के बाद, क्रांतिकारियों का समूह डीएवी कॉलेज से जा रहा था। ब्रिटिश सरकार का एक भारतीय जन्मजात सैनिक क्रांतिकारियों के इस समूह का पीछा कर रहा था। उस सैनिक का नाम चानन सिंह था। चंद्रशेखर आजाद की गोली से चानन सिंह की हत्या हो गई।

पुलिस ने उन सभी क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए लाहौर के हर रास्ते पर नाकाबंदी लगा दी। क्रांतिकारी लाहौर के सुव्यवस्थित व सुरक्षित घरों में पहुंच चुके थे।

यह भी पढ़ें: चंद्रशेखर आजाद के अनमोल वचन

लाहौर से भागना (Running Away from Lahore)

लाहौर में दो दिनों तक छिपे रहने के बाद, सुखदेव ने दुर्गावती देवी से मदद मांगी। दुर्गावती देवी को दुर्गा भाभी के नाम से भी जाना जाता है जो हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन के ही एक सदस्य की पत्नी थी। उन्होंने बठिंडा जाने वाली ट्रेन के माध्यम से लाहौर से बाहर जाने की योजना बनाई। 

अगले दिन सुबह ही भगत सिंह व राजगुरु भरे हुए पिस्तौल लेकर निकल पड़े। किसी भी ब्रिटिश पुलिस अधिकारी को पता ना चल जाए इसलिए भगत सिंह ने अपने बाल कटवा लिये, अपनी दाढ़ी बनवाली और एक पश्चिमी रिवाज की टोपी भी पहन ली। 

दुर्गा भाभी व सिंह पति पत्नी बन गए और नवजात बच्चे को साथ लेकर चल दिये। राजगुरु समान उठाने वाला सेवक बन गया। तीनों वहां से कानपुर की ट्रेन में बैठ गए और कानपुर से वे लखनऊ चले गए। उसके बाद राजगुरु बनारस के लिए तथा सिंह व देवी अपने बच्चे के साथ हावड़ा की ओर चले गए। कुछ दिनों बाद सिंह को छोड़कर के सभी वापस लाहौर आ गए।

अन्य क्रांतिकारी गतिविधि (Other Revolutionary Activity)

भगत सिंह के मन में विचार आया कि वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन की प्रसिद्धि को आम जनता में बहुत तेजी से बढ़ा सकते हैं। उन्होंने संगठन को यह प्रस्ताव दिया कि उन्हें ड्रामे से भरे हुए कार्य करने चाहिए ताकि संगठन को प्रसिद्धि प्राप्त हो।

सिंह के मुताबिक, उन्हें सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली के अंदर एक आंसू बोंब डालना चाहिए। इसका उद्देश्य पब्लिक सेफ्टी बिल तथा ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट के प्रति विरोध जताना था। इन बातों को असेंबली के द्वारा नकारा गया, परंतु वायसराय के द्वारा इन्हें कार्य में लाया गया। असेंबली से बदला लेने के लिए उन्होंने असेंबली में आंसू बम डालना चाहा। 

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली के अंदर दो बॉम्बे फेंके। ये बम इस तरह से बनाए गए थे कि कोई जान-माल का नुकसान नहीं हो परंतु असेंबली के कुछ सदस्यों को इससे नुकसान पहुंचा। असेंबली में बोम से धुआं उत्पन्न हुआ और सिंह व उनके साथी ने वहां से इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए। 

भगत सिंह के साथी क्रांतिकारी पकड़े गए (Arrest of Fellow Revolutionary of Bhagat Singh)

1929 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन ने लाहौर व सहारनपुर में बम फैक्ट्री की स्थापना की थी। 15 अप्रैल 1929 को लाहौर की बम फैक्ट्री के बारे में पुलिस को पता चल गया और उन्होंने इस फैक्ट्री के कुछ मुख्य सदस्य सुखदेव, किशोर लाल व जय गोपाल को गिरफ्तार कर लिया। 

कुछ समय बाद ही सहारनपुर की बम फैक्ट्री का भी पता चल गया और कई क्रांतिकारियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया। 

जॉन सांडर्स की हत्या, असेंबली पर किए गए हमले व बम निर्माण का आपस में संबंध पता करने में पुलिस कामयाब हो गई थी। जिसके बाद उन्होंने सिंह, सुखदेव, राजगुरु व 21 अन्य क्रांतिकारियों को जॉन सांडर्स की हत्या का दोषी माना। 

लाहौर जेल में भगत सिंह व उनके साथी (Bhagat Singh and his associates in Lahore Jail)

भगत सिंह व उनके साथियों को लाहौर जेल में भेजने से पहले वह मियांवाली जेल में थे जहां पर उन्होंने भूख हड़ताल की शुरुआत थी। जेल के वासियों के लिए कुछ अच्छी सुविधाएं व खाद्य पदार्थों के लिए की गई यह भूख हड़ताल भगत सिंह के नेतृत्व में थी। 

सिंह को लाहौर की बोरस्टल जेल में भेज दिया गया। भूख हड़ताल पर रहने के कारण सिंह के वास्तविक वजन (60 किलो) से 6.4 किलो घट गया। 

सिंह ने 5 अक्टूबर 1929 को 116 दिन के बाद अपने पिता की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए अपनी भूख हड़ताल खत्म की। 

7 अक्टूबर 1930 को न्यायाधिकरण कोर्ट ने 300 शब्दों का न्याय पत्र दिया जिसमें सिंह, सुखदेव व राजगुरु को जॉन सांडर्स की हत्या के मुख्य दोषी ठहराए गए। उन तीनों को फांसी की सजा सुनाई गई और अन्य क्रांतिकारियों को कई वर्षों की सजा दी गई। 

भगत सिंह की मृत्यु (Death of Bhagat Singh)

सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षड्यंत्र के केस में 24 मार्च 1931 को फांसी देने की सजा सुनाई गई थी। परंतु ब्रिटिश सरकार ने तीनों क्रांतिकारियों की सजा के समय को 11 घंटे पहले कर दिया ताकि आम जनता सरकार के खिलाफ कोई विद्रोह ना कर दे।

इसलिए, 23 मार्च 1931 को शाम 7:30 बजे भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को लाहौर जेल में फांसी दी गई। सिंह व अन्य 2 क्रांतिकारियों की मृत्यु हो जाने के बाद जेल के अधिकारियों ने उन तीनों के शवों को रात्रि के अंधेरे में ले जाकर के गंदा सिंह वाला गांव के बाहर उनका अंतिम संस्कार कर दिया। अंतिम संस्कार के बाद, उनके पुष्प चिन्हों (राख) को सतलज नदी में बहा दिया गया।

जब तीनों वीर क्रांतिकारियों की मृत्यु की सूचना प्रेस व न्यूज़ में आई तब युवाओं ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ रोष जाहिर किया। कुछ सूचनाओं के मुताबिक, महात्मा गांधी को भी इस हत्याकांड का दोषी भी ठहराया गया था।

भगत सिंह (अंग्रेजी: Bhagat Singh; जन्म: 27 सितम्बर 1907, मृत्यु: 23 मार्च 1931) एक महान क्रांतिकारी नेता थे जिन्होंने सुखदेव व राजगुरु के साथ मिलकर जॉन सांडर्स नामक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या की। भगत सिंह का जन्म 27 सितम्बर 1907 को पंजाब के बंगा नामक गांव (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता किशन सिंह संधु तथा माता विद्यावती थी। वह अपने पिता की दूसरी संतान थे। भगत सिंह के 3 भाई व 3 बहिनें थी।  23 साल की उम्र में भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को ब्रिटिश सरकार ने जॉन सांडर्स व एक भारतीय-ब्रिटिश सैनिक की हत्या का दोषी ठहराते हुए 23 मार्च 1931 को फांसी की सजा दी।

7 अक्टूबर 1930 को न्यायाधिकरण कोर्ट ने 300 शब्दों का न्याय पत्र दिया जिसमें सिंह, सुखदेव व राजगुरु को जॉन सांडर्स की हत्या के मुख्य दोषी ठहराए गए। उन तीनों को फांसी की सजा सुनाई गई और अन्य क्रांतिकारियों को कई वर्षों की सजाएं अलग-अलग तरह से दी गई। 

23 मार्च 1931 को, लाहौर जेल, पाकिस्तान।

3 मार्च 1931 को शाम 7:30 बजे भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को लाहौर जेल में फांसी दी गई। सिंह व अन्य 2 क्रांतिकारियों की मृत्यु हो जाने के बाद जेल के अधिकारियों ने उन तीनों के शवों को रात्रि के अंधेरे में ले जाकर के गंदा सिंह वाला गांव के बाहर उनका अंतिम संस्कार कर दिया। अंतिम संस्कार के बाद, उनके पुष्प चिन्हों (राख) को सतलज नदी में बहा दिया गया।

भगत सिंह एक महान क्रांतिकारी थे जिनका जन्म 27 सितम्बर 1907 को पंजाब के बंगा नामक गांव (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता किशन सिंह संधु तथा माता विद्यावती थी। वह अपने पिता की दूसरी संतान थे। भगत सिंह के 3 भाई व 3 बहिनें थी। 

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शहीद भगत सिंह पर निबंध | Essay on Bhagat Singh in Hindi

शहीद भगत सिंह पर निबंध | Essay on Bhagat Singh in Hindi

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भगत सिंह (Bhagat Singh) एक महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने अपनी जान की आहुति देकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए संघर्ष किया। वे एक ऐसे योद्धा थे जो अपने आत्मबलिदान के लिए प्रसिद्ध हैं और उनका नाम आज भी भारतीय जनता के दिलों में बसा हुआ है। निम्नलिखित निबंध में हम भगत सिंह के जीवन और उनके महत्वपूर्ण कार्यों के बारे में विस्तार से जानेंगे:

भगत सिंह (Bhagat Singh) का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा गांव में हुआ था। वे एक साधारण पंजाबी परिवार से थे, लेकिन उनकी प्रतिभा और संघर्ष ने उन्हें देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक बना दिया।

भगत सिंह का युगदृष्टि सोच और कर्म में था। उन्होंने गांधीजी के नेतृत्व में विभाजन और सट्टाधारी नेताओं के खिलाफ जागरूकता फैलाई और युवा पीढ़ियों को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।

भगत सिंह (Bhagat Singh) का नाम जलियांवाला बाग में हुए बर्बर हत्याकांड के बाद भी बड़े पौर्णिक रूप से जाना जाता है। उन्होंने इस हत्याकांड के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और अंग्रेज साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष का हिस्सा बने।

भगत सिंह, सुखदेव, और राजगुरु के साथ मिलकर सांध से आगे बढ़कर 1929 में लाहौर में सांध में आगवण की घोषणा की थी। सांध के समय उन्होंने बॉम्ब के साथ एक पैम्फलेट भी छोड़ा था, जिसमें उन्होंने अपने संघर्ष के मकसद को स्पष्ट किया था: “सांध के खिलाफ नहीं, बल्कि आजाद भारत के लिए जंग के लिए हमने इस कदम उठाया है।”

23 मार्च 1931 को भगत सिंह (Bhagat Singh), सुखदेव, और राजगुरु को फाँसी की सजा दी गई, लेकिन उनका संघर्ष और बलिदान आज भी हमारे देश के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है।

भगत सिंह (Bhagat Singh) एक महान योद्धा, स्वतंत्रता सेनानी, और एक महान देशभक्त थे। उनकी शहादत ने हमें एक सशक्त और स्वतंत्र भारत की ओर अग्रसर करने का संकेत दिया और उन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। भगत सिंह को हमेशा याद रखा जाएगा और उनकी अद्भुत यात्रा को सतत प्रेरणा के रूप में माना जाएगा।

शहीद भगत सिंह का देश के लिए योगदान | Bhagat Singh Ka Desh Ke Liye Yogdaan

शहीद भगत सिंह (Bhagat Singh) ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना जीवन समर्पित किया और देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका योगदान विभागीय रूप से निम्नलिखित प्रकार से था:

  • जलियांवाला बाग में योगदान: शहीद भगत सिंह ने जलियांवाला बाग मास्साकर के खिलाफ उठी आवाज को मजबूती से सुनाया और इस घमंडी और बर्बर हत्याकांड के खिलाफ खरीदने का प्रमोशन किया।
  • सांध का आलंब: उन्होंने सांध के समय अपने दोस्त सुखदेव और राजगुरु के साथ बम बनाने और उनका आलंब रखने का प्रयास किया, जिसका उपयोग स्वतंत्रता संग्राम के लिए किया जा सकता था।
  • शहादत की तय की योजना: भगत सिंह ने अपनी शहादत की तय की योजना बनाई और उन्होंने अपने आवासीय स्थल में एक आधिकारिक ब्योरा छोड़ा, जिसमें उन्होंने अपने कारणों और लक्ष्य को स्पष्ट किया। उनकी शहादत ने स्वतंत्रता संग्राम को और भी अधिक मजबूती से जिन्दगी दी।
  • युवाओं को प्रेरित करना: भगत सिंह ने युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उनका उदाहरण और उनके योगदान ने देश के युवाओं को उनके दायित्व के प्रति जागरूक किया और उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने की प्रेरणा दी।

भगत सिंह (Bhagat Singh) का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमूल्य माना जाता है। उन्होंने अपने अद्वितीय उपहार और बलिदान के माध्यम से देश को स्वतंत्रता की दिशा में मोड़ने का महान काम किया। उनका योगदान हमें याद दिलाना चाहिए कि स्वतंत्रता के लिए हमें कभी भी तैयार रहना चाहिए और देश की सेवा करने के लिए अपने को समर्पित करना चाहिए।

शहीद भगत सिंह का बलिदान | Bhagat Singh Ka Balidan

भगत सिंह (Bhagat Singh) का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और अद्वितीय है। उन्होंने अपने जीवन को देश के लिए समर्पित किया और आजादी के लिए अपनी जान की आहुति दी।

  • जलियांवाला बाग में सहीदों के लिए आवाज उठाना: जलियांवाला बाग मास्साकर के बाद, भगत सिंह ने इस घमंडी हमले के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से लोगों को समझाया कि यह घटना कितनी बड़ी अन्याय था। उन्होंने जलियांवाला बाग के शहीदों के लिए न्याय मांगा और इस घातक हमले के खिलाफ आंदोलन चलाया।
  • सांध का संगठन और आवाज बुलंद करना: भगत सिंह, सुखदेव, और राजगुरु के साथ, वे सांध का संगठन करके ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। उन्होंने बम बनाने का काम किया और उसे सांध रेलवे स्थान पर फेंका, जिससे ब्रिटिश शासन के खिलाफ यह संकेत मिला कि भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष तेज हो रहा है।
  • शहादत की तय की योजना और शहादत: भगत सिंह ने अपनी शहादत की योजना बनाई और उन्होंने अपने बचाव के दिन अपने आवासीय स्थल पर एक विचारशील ब्योरा छोड़ा। इसमें उन्होंने अपने कारणों और लक्ष्य को स्पष्ट किया और देश के लिए अपना आखिरी समर्पण किया।

शहीद भगत सिंह (Bhagat Singh) का बलिदान देश के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण था, और उन्होंने अपने आत्मबलिदान के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती से सपोर्ट किया। उनकी शहादत ने स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया और भारतीय जनता को उनके उदाहरण से प्रेरित किया। उनका योगदान हमें हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के महत्व को समझने का अवसर देता है और हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता के लिए हमें सबकुछ समर्पित करने की तय करनी चाहिए।

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भगत सिंह के प्रसिद्ध नारे | Bhagat Singh Ke Diye Huye Naare

भगत सिंह (Bhagat Singh), भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी में से एक थे और उन्होंने कई प्रसिद्ध नारे दिए जो स्वतंत्रता संग्राम की भावना को व्यक्त करते थे। ये नारे उनके संघर्ष के महत्वपूर्ण हिस्से थे और उनकी आवाज को देशभक्ति और स्वतंत्रता के प्रति उनके समर्पण को प्रकट करने में मदद करते थे।

  • “इंकलाब जिंदाबाद”: यह नारा भगत सिंह के संघर्ष की भावना को सबसे अच्छी तरह से प्रकट करता है। “इंकलाब” का अर्थ होता है “क्रांति” या “परिवर्तन,” और “जिंदाबाद” का अर्थ होता है “लंबे समय तक जीवित रहो”। यह नारा स्वतंत्रता संग्राम के उत्कृष्ट स्पर्श को सूचित करता है और भगत सिंह और उनके साथी स्वतंत्रता सेनानियों की संकल्पशक्ति को दिखाता है।
  • “सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है”: इस नारे में भगत सिंह और उनके साथी स्वतंत्रता सेनानियों की आक्रांति और इच्छा को व्यक्त किया गया है कि वे अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
  • “इंकलाब जिंदाबाद, सारे आलम में इंकलाब”: यह नारा स्वतंत्रता संग्राम की उस भावना को दर्शाता है कि स्वतंत्रता की आकांक्षा दुनियाभर के लोगों के दिलों में है और यह एक विश्वव्यापी क्रांति का संकेत है।
  • “इंकलाब जिंदाबाद, वीर भगत सिंह जिंदाबाद”: इस नारे में भगत सिंह की महानता और उनके स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को महत्वपूर्ण बनाते हैं और उन्हें एक वीर के रूप में स्वागत करते हैं।

ये नारे और उनके संघर्ष के साथ, भगत सिंह (Bhagat Singh) और उनके साथी स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण हिस्सा था और उनकी शहादत ने देश की आजादी के लिए उनके संकल्प को साबित किया।

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भगत सिंह पर निबंध। bhagat singh essay in hindi

Bhagat Singh Essay in Hindi

शहीद भगत सिंह जी गुलाम भारत के एक महान क्रन्तिकारी थे। भारत की आज़ादी के लिए उनका बलिदान भारत कभी नहीं भूल सकता है। भगत सिंह भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए अपने प्राण की आहुति देने वाले क्रांतिकारियों में से एक थे। आज हम आपके लिए इस पोस्ट में bhagat singh essay in hindi ले कर आये है । इस भगत सिंह पर निबंध को आप स्कूल और कॉलेज इस्तेमाल कर सकते है । इस हिंदी निबंध को आप essay on bhagat singh in hindi for class 1, 2, 3 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 तक के लिए थोड़े से संशोधन के साथ प्रयोग कर सकते है।

  क्रांतिकारियों मे क्रांति की पहचान थे वो, देश के लिए जान देने वाले जवान थे वो,

स्वाभिमान भी उनसे आगे बढ़ने की होड़ करता रहा,  अंग्रेजों को घुटनो पर टिका देने  वाले भगत महान थे वो। 

भारत के स्वतंत्रता सैनानी में सबसे प्रिय वीर भगत सिंह जी थे। आत्मविश्वास, बहादुरी, स्वाभिमान एवं विरोध की मिसाल थे भगत सिंह। वे एक ऐसा चरित्र है जिनके बारे में हम जितना भी जान ले कम ही होगा। आज जो भी लोग भगत सिंह के बारे में नही जानते उनके हृदय में देश के साथ आज भगत सिंह के प्रति भी प्रेम उमड़ आएगा। ऐसी शख्शियत भगवान ने करोड़ों में से एक बनाई है। जो देश के युवा के लिए एक रौचक उदहारण बनकर उभरते हैं। भगत सिंह सभी स्वतंत्रता सैनानियों में से एक अहम किरदार थे।इन्होंने देश के लोगो को जो सीख दी वह स्वतंत्रता के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण व अहम थी। 

प्रस्तावना-  भगत सिंह के जीवन के बारे में जानने से पहले उनके कुछ विचारों से रुबरूं होने की आवश्यकता है। भगत सिंह ईट का जवाब पत्थर से देने वाले व्यक्ति थे। वे देश के लोगो की जान का बदला जान से लेते थे। अपने देश मे अपने ही लोगों के साथ ज्यातकी उन्हें बर्दाश नही थी। वे अपने जीवन के किस्सों से उदहारण देना चाहते है कि हमारा देश सिर्फ हमारा है। कोई और का इसपर कोई अधिकार नही।वे इतने साहसी थे कि वे जिये भी शान से और आज़ाद भी शान से हुए।उन्होंने अपनी बहादुरी से व अपने दृढ़ संकल्प से अंग्रेजों को अपनी जिद की आगे झुका दिया था। भगत सिंह का जीवन उनके प्रति आत्मीयता का भाव पैदा करता है। गर्व देश की भूमि के साथ देश के जवानों की कुर्बानियों का होता है। जिन्होंने अपना सर्वस्व देश को त्याग कर स्वराज की माँग की। 

 बचपन- 28 सितम्बर 1907 को पंजाब के लयालपुल जिले के बंगा गांव में भगत सिंह का जन्म हुआ। सरदार किशन सिंह व विद्यावती कौर की खुशी आज दुगनी थी। आज उनके यहां पुत्र भी हुआ और भगत सिंह के चाचाजी को आज जेल से रिहा किया गया था। भगत सिंह का परिवार भी देश भक्त था। ऐसे महान परिवार में महान क्रांतिकारी भगत सिंह का जन्म हुआ। जिन्होंने अपने जीवन से सबको अचंभे में डाल कर रख दिया। मिसाल हो तो भगत सिंह जैसी जिन्होंने देश के लिए जीने व देश के लिए ही मारने की ठानी थी। वे अंग्रेजों के बचपन से ही विरोधी थे। उस समय ब्रिटिश सरकार थी। और उस वक़्त सरकारी विद्यालय भी ब्रिटिश सरकार के ही थे। उन्होंने वो विद्यालय में पढ़ाई ना करके आर्य समाज के दयानंद वैदिक विद्यालय से शिक्षा ग्रहण की।बचपन से ही ब्रिटिशर्स के प्रति उनके हृदय में आक्रोश था। उनके बचपन की एक घटना उनके पिता जी को हैरान करने वाली थी। एक बार भगत सिंह अपने पिताजी के साथ खेत पर गए। वहां उन्होंने अपने पिता जी से पूछा की आप ये अनाज बोते हो आपको इससे क्या मिलता है। पिताजी ने कहा कि बेटा इससे ढेर सारी फसल उगती है। इसे हम बेच देते है। तभी भगत सिंह सिंह 12 वर्ष के भी नही थे। भगत सिंह ने अपने पिता जी से कहा फिर आप बंदूक क्यों नही बोते, उससे बहुत सारी बंदूक उग जाएगी फिर अंग्रेजों पर हम उसे चला देंगे।भगत सिंह जी की बात में नादानी थी क्योंकि उन्हें ये नही पता था कि बंदूकें खेत से नही उगती। लेकिन उनकी बात से उनके पिताजी बड़े हैरान हो गए। इतनी छोटी सी उम्र में उनके हृदय में अंग्रेजों के प्रति आक्रोश था।उन्हें इस बात की खुशी थी कि भगत सिंह देश प्रेमी है।

भगत सिंह का जीवन महज 23 वर्ष 5 माह व 23 दिन का था। उनके जीवन के महत्वपूर्ण सालों से हम उनके जीवन और उनके योगदान के बारे में जानेंगे। 

13 अप्रैल 1919- इस दिन जलियावाला बाघ में हत्या कांड हुआ था। जहाँ हज़ारों की संख्या में भारतीय लोगो को अंग्रेजों ने गोलियों से भुनवा दिया। अंग्रेजों द्वारा का एक एक्ट लाया गया था कि किसी भी भारतीय पर बिना मुकदमा चलाये उसे गिरफ्तार किया जा सकता है। उस एक्ट का नाम था रॉलेट एक्ट। इसके खिलाफ भारतीय जलियावाला बाघ में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। जनरल डायर ने हजारों प्रदर्शनकारियों को गोलियोन से भुनवा दिया। ये घटना को देखने के लिए भगत जी 20 किलोमीटर पैदल चलकर जलियावाला बाघ पहुंचे।वहां पहुँच कर जो उन्होंने देखा उसने उनकी रूह को झंझोड़ कर रख दिया। हज़ारों की संख्या में लाशें थी।खून से रंगी हुई भूमि थी।उन्होंने वहां की खून से रंगी हुई मिट्टी उठायी और शपत ली कि वह इसका बदला अंग्रेजों से ज़रूर लेंगे। उस दिन वह मिट्टी को लेकर घर आगये।

 1 अगस्त 1920 में भगत सिंह ने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। जिसमे गांधी जी अहिंसक रूप से सभी को अंग्रेजों के यहां से नौकरी छोड़ने,टैक्स ना देने, अंग्रेज़ी वस्तु व कपड़े जलाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। तभी भगत सिंह जी ने भी बचपन मे अंग्रेज़ी किताबों को जलाया व इस आंदोलन में भूमिका निर्धारित की।

 5 फरवरी 1922  इस वर्ष चौरी-चौरा कांड हुआ जिसमें भारतीय ने अंग्रेजों  के पुलिस थाने में आग लगा दी थी। जिसमे पुलिस वालों की मृत्यु हुई थी। गांधी जी  हिंसात्मक आंदोलन के पक्ष में नही थे। इसीलिए उन्होंने आंदोलन वापिस ले लिया। ये बात भगत सिंह जी को पसंद नही आयी। 

इसके बाद भगत जी स्वयं क्रांतिकारी दल में शामिल हुए। जिसके प्रमुख भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव व राजगुरु थे ।1928 में उन्होंने नौजवान भारत सभा “हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन” का विलह कर ” हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” नाम रखा। 

30 अक्टूबर 1928- 17 दिसंबर 1928-  साइमन कमीशन के द्वारा लाठी चार्ज में 30 अक्टूबर 1928 को लाला लाजपत राय घायल हुए। 17 नवंबर 1928  को उनकी मृत्यु हो गयी। देश को इसका बड़ा सदमा पहुंचा।इस बार भगतसिंह, चंद्रशेखर, राजगुरु, जयगोपाल ने 17 दिसंबर 1928 को लाहौर कोतवाली पर ब्रिटश के एक प्रमुख जॉन सॉन्डर्स की हत्या की। इस प्रकार लाला लाजपतराय जी की मृत्यु का बदला लिया। इस घटना के बाद भगत जी ने अपनी दाड़ी व बाल कटवा लिए ताकि कोई उन्हें पहचान न सके।

8 अप्रैल 1929- अंग्रेज़ो द्वारा मजदूर विरोधी बिल पास किया जाने वाला था। ब्रिटिश सरकार को गरिबों से व व्यापारियों से कोई मतलब नही था। वे मनमानी कर रहे थे। ये भगतसिंह व चंद्रशेखर आज़ाद को मंजूर नही था। भगतसिंह ने बटुशेखर दत्त के साथ दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम फेंके। उन्होंने उसमे कोई भी नुकसानदायक पदार्थ नही मिलाया था। उनका उद्देश्य नुकसान पहुंचाना नही बल्कि अंग्रेजों को नींद से जगाना और विरोध करना था।उन्होंने खाली जगह बम फेंके थे। इसके बाद खुद अपने आप को ब्रिटिश सरकार के हवाले इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगा कर किया।उन्होंने अपनी जान से बढ़ कर अंग्रेजों के अत्याचारों का विरोध करना व उनके अत्याचारों को सामने लाना समझा। 

जेल में क्रांति- भगतसिंह जी देश के लिए ही जीना और मरना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने कभी अपनी जान की परवाह नही की। जब वह जेल में आये तब उन्होंने देखा कि यहां भी अंग्रेज़ी कैदी और भारतिय कैदियों के बीच भेद- भाव हो रहा है। भारतीय कैदियों की रसोई में कॉकरोच, चुहे व बहुत गंदगी थी। वही अंग्रेज़ी कैदियों के लिए सब साफ सफाई थी। कपड़े भी उनको समय पर बदलने नही दिए जाते थे। भगतसिंह जी ने ठान लिया कि जब तक ये भेद भाव खत्म नही होगा तब तक व भोजन ग्रहण नही करेंगे। जून 1929 में भगतसिंह और उनके दल के लोगो ने भूख हड़ताल करवाई। जिसे तुड़वाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने अथक प्रयास किये। बर्फ की सिल्लियों पर लेटा कर उन्हें कौड़ियों से मारा गया। उनके मुह में दूध डालने का प्रयास किया। पर उन्होंने एक बूंध भी दूध नही पिया था। बाद में उन्हें लाहौर जेल में रखा गया। उनकी हड़ताल को देख सभी भूख हड़ताल का हिस्सा बने। जिसमे सुखदेव व राजगुरु भी थे। 13 सितंबर को जितेंद्रदास नाथ की 63 दिन भूखे रहने पर मृत्यु हो गयी। देश ने इसपर बहुत दुख जताया। इसके बाद 5 अक्टूबर 1929 को अंग्रेजों को भगत सिंह के दृढ़ संकल्प के आगे घुटने टेकने पड़े। भगतसिंह ने ब्रिटिश सरकार को मजबूर कर दिया।ब्रिटिश सरकार को उनकी शर्तें माननी पड़ी। भगतसिंह ने इस प्रकार जेल में समानता लाने की शुरुवात की। वे 116 दिन बीना खाएं पिये रहे। पर अपने संकल्प को पूरा किया। 5 अक्टूबर 1929 को जब उनकी शर्तें मान ली गयी तब उन्होंने अपनी हड़ताल तोड़ी।

26 अगस्त 1930 को अदालत ने उन्हें विस्फोट की वजह से अपराधी सिद्ध किया और 7 अक्टूबर को 68 पेज का निर्णय दिया। जिसमें भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई। बाकी लोगो को आजीवन कारावास की सजा दी। 

23 मार्च 1931-  ये वो दिन था जब देश के लिए भगतसिंह ने जान न्योछावर की। उनकी ख्वाइश  थी की वे देश के लिए ही अपने प्राण दे। उनके मुख पर फांसी का जरा भी दुख नही था। वे आज के दिन सबसे ज़्यादा खुश थे। भगतसिंह,राजगुरु व सुखदेव तीनो इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। खुशी से झूम रहे थे। और देश के प्रति अपने समर्पण को अपना सौभाग्य समझ रहे थे। उस दिन ये भूमि भी रोई होगी जिस दिन भगतसिंह ने अपने आप का समर्पण  किया। पूरे देश मे इसका दुख था। इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगा कर वे फांसी पर चढ़े। लेकिन उस दिन वह अपने जैसे सेंकडो भगतसिंह देश को दे गए। उन्हें देख ना जाने कितने लोग आज भी प्रेरित होते है। 23 साल की उम्र में देश को अपनी जान समर्पण की। 

उपसंहार-  भगतसिंह ने हमें यह सीखाया कि जीवन चाहे छोटा जियो पर सार्थक जियो । देश के लिए वे एक मिसाल हैं। अपने चेहरे पर एक शिकन लेकर भी वो शहीद नही हुए। वो सदा साहस व स्वाभिमान से जिये। मानो स्वाभिमान भी उनके रूप को देख हैरान होगा। 23 साल जीने वाले भगत सिंह को 23000 वर्ष तक या इससे भी ज़्यादा वक़्त तक याद रखा जाएगा। वे हमारे दिलों में, युवा पीढ़ी में व सीमा पर तैनात हर सैनिक में प्रेरणा के रूप में रहते है। उन्ही के कारण हमारा मनोबल आज भी कायम है। वे देश के लिए शहीद हुए और सैंकड़ो भगतसिंह के आगमन का इशारा दे गए। 

भूमि ऋणि है ऐसे वीरों की जो जिये भी देश के लिए और शहीद भी देश के लिए हुए।

आपका और मेरा सौभाग्य है जो मैं इतने बड़े क्रांतिकारी के बारे में लिख पा रही हु और आप पढ़ पा रहे है। तहे दिल से सलामी है ऐसे वीरों को, हम बहुत आभारी होंगे व नम आंखों से आज उन्हें याद कर रहे होंगे। भगत सिंह विश्वास, प्रेरणा, मनोबल, स्वाभिमान बनकर आज भी देश के हर युवा में झलकते है जो गलत के खिलाफ आवाज उठाते है… 

” मेरे सीने में जो जख्म है वो सब फूलों के गुच्छे है,

 हमें तो पागल ही रहने दो हम पागल ही अच्छे है” 

                                          -भगतसिंह

              (इंकलाब जिंदाबाद….!)

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Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi – भगत सिंह पर निबंध

December 26, 2017 by essaykiduniya

Get information about Bhagat Singh in Hindi. Here you will get Paragraph and Short Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi Language for Students and Kids of all Classes in 150, 300 and 800 words. यहां आपको सभी कक्षाओं के छात्रों के लिए हिंदी भाषा में भगत सिंह पर निबंध मिलेगा।

Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi – भगत सिंह पर निबंध

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Short Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi Language – भगत सिंह पर निबंध ( 150 words )

भगत सिंह एक युवा भारतीय क्रांतिकारी थे जिन्हें “शहीद भगत सिंह” के नाम से जाना जाता है। वह एक महान स्वतंत्रता सेनानी और एक राष्ट्रीय नायक थे। भगत सिंह सबसे कम उम्र के स्वतंत्र आश्रयों में से एक हैं जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के लिए अपनी जान का त्याग किया। वह सिर्फ 23 वर्ष का था जब उसे फांसी दी गई थी। भगत सिंह और उनके सहयोगी ने कुछ ब्रिटिश अधिकारियों को मार डाला और उन लोगों में से एक थे जिन्होंने लालापत राय पर लाठी चार्ज का आदेश दिया था। बाद में उन्होंने खुद को पुलिस अधिकारियों को आत्मसमर्पण कर दिया। भगत सिंह जेल की खराब परिस्थितियों से दुखी थे। वह जेल की स्थितियों में सुधार के लिए भूख हड़ताल पर था। भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को दोषी ठहराया गया और फांसी दी गई। भारतीय स्वतंत्रता में उनके प्रयासों के कारण भगत सिंह ने बहुत सम्मान अर्जित किया था।

Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi – भगत सिंह पर निबंध ( 300 words )

भारत में बहुत से क्रांतिकारी वीर हुए है जिनमें से भगत सिंह सबसे कम उमर के जोश से भरपूर युवक थे। उनका जन्म 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के लयालपुर के बंगा नामक गाँव में हुआ था। वे एक सिक्ख परिवार में जन्में थे जिन्होंने आर्य समाज के उसूलों को अपना लिया था और उनके घर के लोग क्रांतिकारी थे। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिँह और माता का नाम विद्यावती कौर था। भगत सिँह के जन्म के दिन ही उनके पिता और चाचा जेल से रिहा हुए थे और तभी उनकी दादी ने उनका नाम भागोवाला रखा था।

उन्होंने नौवीं तक की पढ़ाई स्थानीय डी.एवी. स्कूल से पूरी की और 1923 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। 13 अप्रैल,1919 को हुए जलियावाल बाग हत्याकांड ने उन्हें पूरी तरह से झकझोर दिया था। बाद में उन्होंने लाहौर के नैशनल कॉलेज की पढ़ाई छोड़ दी थी और क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए थे। उन्होंने महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में भी सहयोग दिया था। लेकिन उन्हें अहिंसा का मार्ग पसंद नहीं आया और उन्होंने हिंसा का रास्ता चुन लिया। उन्होंने चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक पब्लिकेशन पार्टी की स्थापना की।

अंग्रेजी सरकार को जगाने के लिए भगत सिंह ने राजगुरू के साथ मिलकर दिल्ली स्थित सैंट्रल असैंबली में बम फेंका और वहीं पर खड़े रहें और अपनी गिरफ्तारी दी। उन्हें लाहौर ष्डयंत्र में फसाँ कर जेल भेज दिया गया और फाँसी की सजा सुनाई गई। 23 मार्च, 1931 को उन्हें फाँसी दे दी गई थी। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद के नारे के साथ अपनी जिंदगी बलिदान कर दी थी। वह मरने को बाद भी अमर है। उन्हें आज भी बड़े गर्व के साथ याद किया जाता है। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी भारत को अंग्रेजी शासन से आजादी दिलाने में निकाल दी थी और देश की खातिर हँसते हँसते फाँसी चढ़ गए थे।

Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi – भगत सिंह पर निबंध ( 800 words )

भगत सिंह शहीद-ए-आज़म (शहीदों के सम्राट) के रूप में प्रसिद्ध हैं। भगत सिंह की फांसी ने भारतीय युवाओं पर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मजबूत प्रभाव डाला था। भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को एक जाट-सिख परिवार में सरदार किशन सिंह संधू और विद्यावती के जन्म में हुआ था। चाक नंबर 105 में, जिसे ल्यालपुर (अब फैसलाबाद) जिले (अब पाकिस्तान में) में बेंज के रूप में जाना जाता है वह एक देशभक्त परिवार से आया था। उनके परिवार के कुछ सदस्यों ने भारत की आजादी के समर्थन में सक्रिय रूप से आंदोलन में भाग लिया। अर्जुन सिंह, स्वामी दयानंद सरस्वती के हिंदू सुधारवादी आंदोलन, आर्य समाज का अनुयायी थे, उनके चाचा और उनके पिता गदर पार्टी के सदस्य थे। स्कूल में भगत सिंह बहुत अच्छे और अनुशासित छात्र थे।

पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा इसने अपने महासचिव सहित पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन के सदस्यों का ध्यान खींचा। भगत सिंह ने एक बहुत कुछ कविता और साहित्य पढ़ा जो पुंज ने लिखा था अबी लेखकों और उनके पसंदीदा कवि अल्लामा इकबाल थे जब वह नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तो भगत ने असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। उन्होंने डीएवी में अध्ययन किया। हाई स्कूल और कॉलेज, लाहौर लाला लाजपत राय और भाई परमानंद ने उस कॉलेज में पढ़ाया। उन्होंने युवा भगत को गहराई से प्रभावित किया। वहां उन्होंने एक छात्र संघ का आयोजन किया। 1923 में, वह गुप्त क्रांतिकारी पार्टी में शामिल हुए बाद में, इसे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) के रूप में जाना जाने लगा।

वह अपनी अग्रणी सदस्य बन गए| 1925 में, भगत सिंह ने आतंकवादी युवा संगठन, पंजाब की नौवहन भारत सभा की शुरुआत की। इंटरमीडिएट परीक्षा पूरी करने के बाद, भगत सिंह को शादी करने पर दबाव डाला गया था, लेकिन वह घर से भाग गया और कानपुर आया उन्हें अखबारों, प्रताप और अर्जुन में रोजगार मिला। उन्होंने किर्ति नाम की एक समाजवादी पत्रिका के संपादकीय स्टाफ के रूप में भी काम किया भगत सिंह ने इन अख़बारों में एक छद्म नाम के तहत भगत सिंह को एक कार्यकर्ता और एक बौद्धिक दोनों के रूप में लिखा था। 1926 में, वह आजाद और कुंदनलाल की निरर्थक योजना में शामिल हो गए। यह काकूरी केस के कैदियों को बचाने के लिए था फिर, भगत सिंह ने अपने क्रांतिकारी मित्रों सुखदेव और राजगुरू के साथ 17 दिसंबर, 1928 को सॉन्डर्स (जो लाला लाजपत राय पर पुलिस हमले के लिए जिम्मेदार थे) को मार डाला।

लाहौर में विरोधी साइमन आयोग के आंदोलन के दौरान, लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए थे पुलिस के हमले के कारण उनकी मृत्यु हुई। इसलिए, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) ने उनकी मृत्यु पर बदला लिया। भगत सिंह बहुत शक्तिशाली वक्ता थे उनके सरगर्मी भाषण बहुत उत्साहजनक थे। जब 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली विधानसभा में लोक सुरक्षा विधेयक पेश किया गया था, भगत सिंह और बट्टुकेश्वर दत्ता ने मध्य विधानसभा में बम विस्फोट कर दिया। बम न मारे गए और न ही किसी को भी घायल; सिंह और दत्ता ने दावा किया कि यह उनके हिस्से पर एक जानबूझकर कार्य था। यह ब्रिटिश फोरेंसिक जांचकर्ताओं द्वारा साबित हुआ जो पाया गया कि बम चोट के कारण पर्याप्त शक्तिशाली नहीं था, और इस तथ्य से कि लोगों से बम फेंक दिया गया था। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जीवन के लिए सजा सुनाई गई। अपने सहयोगियों के साथ भगत सिंह बोरस्टल विंग जेल, लाहौर में एक भूख हड़ताल पर गए थे।

उन्होंने ब्रिटिश राजनीतिक कैदियों के समकक्ष जेल में बेहतर रहने की स्थिति की मांग की। यह तेजी 63 दिनों के लिए जारी है उपवास के दौरान, उनके सहयोगियों में से एक जतिन दास का निधन हो गया। फिर बड़े पैमाने पर आंदोलन ने जेल अधिकारियों को अपनी मांग पूरी करने के लिए मजबूर किया। जुलाई 1929 में लाहौर षड़यंत्र केस शुरू हुआ। इस मामले में, भगत सिंह पर आरोप लगाया गया था। उसे मौत की सजा सुनाई गई 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी दी गई थी। उन्होंने खुशी से चंचलता इन्कुलैब जिंदाबाद जप कर ‘। भगत सिंह फांसी पर अपने साथियों के साथ मर गया। उनकी मृत्यु ने उन्हें एक किंवदंती बनाया। एक क्रांतिकारी युवा के रूप में शहीद भगत सिंह की गतिविधियों ने उन्हें बहुत लोकप्रिय बना दिया। गोदी से उनके भावुक बयान, ब्रिटिश न्याय के लिए उनकी अवमानना, “इन्कीलैब जिंदाबाद” का उनका नारा अपने देशवासियों में फंस गया और युवाओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। आज भी पूरा देश भगत सिंह के बलिदान को याद करता है।

हम आशा करते हैं कि आप इस निबंध (  Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi – भगत सिंह पर निबंध ) को पसंद करेंगे।

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शहीद भगत सिंह पर निबंध Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi

शहीद भगत सिंह पर निबंध Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi

क्या आप भगत सिंह पर निबंध (Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi) खोज रहे हैं यदि हां तो इस लेख को पढ़ने के बाद आपकी सारी तलाश पूरी होने वाली है। इस लेख में शहीद भगत सिंह पर निबंध बहुत ही सरल शब्दों में लिखा गया है।

Table of Contents

प्रस्तावना (शहीद भगत सिंह पर निबंध Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi)

भारत  की पवित्र माटी पर एक बार नहीं बल्कि कई बार महान आत्माओं ने जन्म लिया है और भारत को महान बलिदानों की भूमि बनाया है। ऐसे ही महापुरुषों में से एक भारत माता के प्यारे शहीद भगत सिंह ने देश के लिए खुद को बलिदान कर दिया।

भगत सिंह का ताल्लुक एक किसान परिवार से था। उनके माता पिता आर्य समाज के विचारों से बहुत प्रभावित थे और उनकी राह पर ही चलते थे। जिसका असर बचपन से ही भगत सिंह पर होने लगा था।

उन्होंने अपनी शिक्षा छोटे से गांव से प्रारंभ की और प्रारंभिक शिक्षा पूरा करने के बाद उनका दाखिला लाहौर में स्थित एक कॉलेज में हुआ।

भगत सिंह के पिता तथा चाचा ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन करते थे जिसके लिए जेल भी जाना पड़ा था। ऐसे देश भक्ति माहौल में जन्म लेने से बचपन से भगत सिंह के अंदर देश प्रेम की भावना जागने लगी थी।

जब भगत अपनी कॉलेज की पढ़ाई कर रहे थे उसी समय पूरे देश में ब्रिटिश सरकार के विरोध मैं कई उग्र आंदोलन चलाए जा रहे थे। हिंदुस्तान को अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्र करने के लिए भगत सिंह ने अपना सब कुछ त्याग दिया और देश हित में चलाए जाने वाले संगठन में जुड़ गए।

देश के लिए लड़ते लड़ते भगत सिंह को आखिर में ब्रिटिश सरकार द्वारा फांसी पर चढ़ा दिया गया। आज भले ही भगतसिंह हमारे बीच नहीं है किंतु उनके विचार उनके द्वारा किए गए काम सदा ही हमारे दिल में जीवित रहेंगे।

और पढ़े : शहीद दिवस पर भाषण

प्रारंभिक जीवन Early life of Bhagat Singh in Hindi

भगत सिंह का जन्म वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब में लायलपुर जिला के बंगा गांव में 27 सितंबर 1907 में हुआ था। भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह तथा माता का नाम विद्यावती कौन था।

 भगत सिंह के जन्म से पहले उनके पिता और दो चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह को अंग्रेजो के खिलाफ प्रदर्शन करने के जुर्म में जेल में बंद कर दिया गया था। 

जिस समय भगत सिंह का जन्म हुआ उसी समय उनके पिता और चाचा भी जेल से रिहा हुए थे। उस समय भगत के घर में  जैसे खुशियों का लहर छा गया था।  भगत सिंह की दादी ने उनका नाम  भागो वाला रखा था जिसका अर्थ होता है भाग्यशाली। बाद में उन्हें भगत सिंह कहकर पुकारा जाने लगा।

देशभक्ति का  रंग शुरुआत से ही भगत सिंह पर पड़ने लगा था। ब्रिटिश सरकार की भारतीयों के प्रति किए जाने वाले क्रूर जुल्म से भगत सिंह इतने आहत थे कि उनके मन में अंग्रेजों के प्रति  घृणा की आग जलने लगी थी।

शिक्षा Education of Bhagat Singh in Hindi

भगत सिंह को स्कूल जाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था। जब उनसे पूछा जाता था की वह क्यों स्कूल नहीं जाते हैं तो उनका एक ही जवाब होता था की ब्रिटिश हुकूमत में चलने वाली स्कूलों में पढ़ कर उनकी नौकरी करने से बेहतर है कि देश के स्वतंत्रता में खुद को तपा दिया जाए।

भगत सिंह की प्रारंभिक शिक्षा उनके ही गांव के एक प्राइमरी स्कूल से हुई। प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने के बाद उनका दाखिला लाहौर के डी.ए.वी  कॉलेज  में हुई थी।भगत सिंह ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद नेशनल कॉलेज से  बीए. की पढ़ाई  की।

कॉलेज में पढ़ने के दौरान ही उनकी मित्रता बटुकेश्वर दत्त से हुई। इसके बाद भगत की मुलाकात कई अन्य नौजवानों से हुई जो देश के स्वतंत्रता में योगदान देना चाहते थे।।

क्रांतिकारी के रूप में उनके महान कार्य Bhagat Singh as A Revolutionary

13 अप्रैल 1999 को बैसाखी के दिन अमृतसर में स्थित स्वर्ण मंदिर के पास जलिया वाले बाग में रोलेट एक्ट के विरोध में एक सभा आयोजित की गई थी।

इस सभा के बारे में पता लगने के बाद अंग्रेजी ऑफिसर जनरल डायर ने अपने कुछ लोगों के साथ आकर बिना किसी चेतावनी के सभी लोगों पर गोलियों की बौछार कर दी। जिससे कई लोगों की जान गई और बहुत सारे लोग घायल भी हुए।

भगत सिंह को इस बात का पता लगा तो वह केवल 12 वर्ष के थे और अपने स्कूल से 12 मील दूर पैदल चलकर जलिया वाले बाग पहुंच गए। उन्होंने अपने ही लोगों की लाशों की ढेर देखी भगत सिंह अपने आंसू रोक नहीं पाए।

जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद भगत सिंह ने वहीं खड़े रहकर जमीन से कुछ लाभ उठाकर अपने सिर पर लगा लिया और कसम खाई कि वह देश को स्वतंत्रता दिला कर ही रहेंगे।

1 अगस्त 1920 में इस घटना के विरोध में गांधी जी तथा उनके साथियों द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया गया जिसमें पश्चिमी देशों में बनने वाले हर एक चीज का बहिष्कार किया जाने लगा।

गांधी जी के विदेशी बहिष्कार विचारधारा से  भगत सिंह बहुत प्रभावित हुए। गांधीजी को आदर्श मानकर उनके समर्थन में आ गए थे।

4 फरवरी 1922 में अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में स्वयंसेवकों द्वारा  उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले  के चौरी चौरा में जुलूस निकाला जा रहा था।

इसी दौरान पुलिस और स्वयंसेवकों के बीच हिंसक झड़प  हो गई और पुलिस वालों ने भीड़ पर गोलियां चला दी जिससे कुछ लोगों की जान चली गई और कई लोग घायल हो गए।

हिंसक हुई भीड़ ने यहां के पुलिस स्टेशन में आग लगा दिया जिससे 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। इस घटना के बाद गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस ले लिया। आंदोलन वापस लेने के बाद भगत सिंह को गहरा सदमा पहुंचा और उन्होंने गांधी जी से मनभेद कर लिया।

भगत सिंह ने  लाहौर में अपने नेशनल कॉलेज की पढ़ाई पूरी किए बिना ही राष्ट्रवादी संगठनों में जुड़ गए और नौजवान भारत सभा की स्थापना की।  इसका उद्देश्य नौजवानों को इकट्ठा  करना था।

कुछ समय बाद भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में स्थापित किए गए गदर दल से जुड़े जहां उनकी मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल तथा अन्य कई क्रांतिकारी से हुई।

काकोरी कांड को अंजाम देने के बाद राम प्रसाद बिस्मिल जैसे अपने ही 4 क्रांतिकारियों साथियों के फांसी के बाद देश प्रेम की भावना इनमें इतनी बढ़ गई कि भगत ने चंद्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन से जुड़ गए और उसे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन नया नाम दिया।

1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लोगों का प्रदर्शन हुआ था जिसमें अंग्रेजी सैनिकों ने लोगों पर लाठीचार्ज किया जिसमें लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह राजगुरु और जयगोपाल ने योजना बनाकर अंग्रेजी ऑफिसर सॉरडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी।

8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय असेंबली में अपने साथियों के साथ मिलकर बम फेंक दिया जिसके बाद इन्हें और उनके क्रांतिकारी साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

निजी जीवन Personal Life of Bhagat Singh in Hindi

भगत सिंह का हृदय केवल और केवल भारत माता के लिए ही धड़कता था। एक बार इनके माता-पिता ने इनसे बिना राय लिए ही इनकी शादी करने का फैसला कर लिया जिसका पता लगने पर भगत सिंह ने बिना किसी को बताए घर से भाग गए और क्रांतिकारी संगठनों में जुड़ गए।

 भगत सिंह एक नास्तिक थे। उन्हें ईश्वर में बिल्कुल भी विश्वास और श्रद्धा नहीं था। जेल में रहने के दौरान ही भगत सिंह ने कई डायरिया और किताबें भी लिखी। 

उन्होंने अंग्रेजी भाषा में एक लेख भी लिखा था जिसका शीर्षक था ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ जो उस समय कई लेखों में चर्चा का केंद्र बना हुआ था।  

मृत्यु Death of Bhagat Singh in Hindi

1929 में केंद्रीय असेंबली में  बम फेंकने से पहले ही इन्होंने सोच लिया था कि उन्हें जो भी सजा दी जाएगी उसे स्वीकार कर लेंगे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने मिलकर जानबूझकर ऐसी जगह बम फेंका था जहां पर लोग मौजूद न हो।

घटना के बाद अंग्रेजी ऑफिसर द्वारा सभी को गिरफ्तार कर लिया गया। 26 अगस्त 1930 को भारतीय दंड संहिता के आधार पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुना दी गई।

देश के कई भारतीय वकीलों ने इस सजा को टालने की कोशिश की किंतु ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। 

 23 मार्च 1930 की शाम को उन तीनों अमर क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई। उस समय वहां पर जो भी भारतीय उपस्थित थे वे अपने आंसू रोक नहीं पाए। 

ऐसा बताया जाता है कि जब भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु फांसी के लिए ले जाए जा रहे थे तब वह एक ही गीत गुनगुना रहे थे –  मेरा रंग दे बसंती चोला..

फांसी होने के बाद अंग्रेजी सरकार  लोगों के उमड़ रहे भीड़ को देखकर इतना खौफ में आ गई थी के उन शहीदों के मृत शरीर के टुकड़े करके बोरी में भरकर फिरोजपुर ले जाकर मिट्टी के तेल से जला दिया।

जब लोगों को इस बात का पता लगा तो उसी दिशा में आगे बढ़ने लगे। लोगों की भीड़ आते देख अंग्रेजों ने बचे कुचे टुकड़ों को नदी में फेंक दिया और वहां से भाग गए।

जब गांव वाले पास आए तब उन्होंने उनके मृत शरीर के टुकड़ों को एकत्रित करके विधिवत दाह संस्कार किया। 

शहीद भगत सिंह पर 10 लाइन 10 lines on Shaheed Bhagat Singh in Hindi

  • भगत सिंह का जन्म वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब में लायलपुर  जिला के बंगा गांव में 27 सितंबर 1907 में हुआ था। 
  • शहीद भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह तथा माता का नाम विद्यावती कौन था।
  • उनका पूरा परिवार दयानंद सरस्वती से प्रभावित होकर आर्य विचारधारा को अपने जीवन में अपना लिया था। 
  •  भगत सिंह के जन्म से पहले उनके पिता और दो चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह को अंग्रेजो के खिलाफ प्रदर्शन करने के जुर्म में जेल में बंद कर दिया गया था। 
  • शहीद भगत सिंह की दादी ने उनका नाम  भागो वाला रखा था जिसका अर्थ होता है भाग्यशाली। बाद में उन्हें भगत सिंह कहकर पुकारा जाने लगा।
  •  भगत सिंह की प्रारंभिक शिक्षा उनके ही गांव के एक प्राइमरी स्कूल से हुई। प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होने के बाद उनका दाखिला लाहौर के डी.ए.वी  कॉलेज  में हुई थी।
  • शहीद भगत सिंह को जलियांवाला बाग हत्याकांड बात का पता लगा तो वह केवल 12 वर्ष के थे और अपने स्कूल से 12 मील दूर पैदल चलकर जलिया वाले बाग पहुंच गए।
  •  गांधी जी के विदेशी बहिष्कार विचारधारा से  भगत सिंह बहुत प्रभावित हुए। गांधीजी को आदर्श मानकर उनके समर्थन में आ गए थे।
  • भगत ने चंद्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन से जुड़ गए और उसे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन नया नाम दिया।
  • उन्होंने एक लेख भी लिखा था जिसका शीर्षक था ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ जो उस समय कई लेखों में चर्चा का केंद्र बना हुआ था।  

निष्कर्ष conclusion

इस लेख में आपने भगत सिंह पर निबंध (Essay on Shaheed Bhagat Singh in Hindi) हिंदी में पढ़ा। आशा है यह लेख आपको पसंद आया होगा अगर यह लेख आपको अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरुर करें।

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  • निबंध ( Hindi Essay)

freedom fighter bhagat singh essay in hindi

Essay on Bhagat Singh in Hindi

भारत एक ऐसा देश है जो कई बार गुलाम बन चुका है परंतु इसकी आजादी गर्व पूर्ण हम सबको प्राप्त हुई है। इसकी आन बान शान बचाने के लिए ना जाने कितनी ही वीर शहीद हो गए परंतु देश को कभी कोई आंच नहीं आने दी। ऐसे ही एक क्रांतिकारी अमर शहीद भगत सिंह की बात हम आज कर रहे हैं। अमर शहीद भगत सिंह (Essay on Bhagat Singh in Hindi) का नाम सुनकर ही छाती गर्व से चोरी हो जाती है एक सिख थे वह परंतु हमेशा के लिए लोगों के दिलों में बस कर रह गए।

अमर शहीद भगत सिंह का जन्म 1907 में 27 सितंबर को लायलपुर जिला के बांदा में हुआ था जो कि डिवीजन के बाद पाकिस्तान हो गया है। उनके पिता का नाम किशन सिंह था जो अंग्रेजों के अंदर में कार्य करते थे। उनकी माता विद्यावती उनके साथ और भी पुत्रों को एक साथ भारत की वीर कहानियां सुनाया करती थी। भगत सिंह बचपन से ही भारत को अपनी माता व जननी समझते थे जिस कारण भारत के खिलाफ एक भी शब्द सुनना पसंद नहीं करते थे। उनकी यही इच्छा पढ़कर उन में समाती गई और उन्हें शहीद होने के लिए प्रेरित करती गई। धीरे-धीरे उनका यह जिज्ञासा बढ़कर उनकी रूचि बन गई अब वह अपनी सारी जिंदगी को भारत पर न्योछावर करने के लिए तत्पर रहते थे। अंग्रेजों द्वारा भारत को और भारत वासियों को कष्ट दिया जाता।

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क्रांतिकारी आंदोलन (Revolutionary Movement)

उस वर्ष भगत सिंह केवल 12 साल के थे जब जलिया वाले बाग की कांड की घटना सामने आई। उस वर्ष भारत के हजारों क्रांतिकारी आंदोलन में जलियांवाला बाग के मैदान में बैठे थे अचानक ही अंग्रेजों ने उन पर हमला कर दिया देखते-देखते जलिया वाले बाग की मिट्टी लाल हो गई वहां का कुआं लाशों से भर गया। बच्चे बूढ़े आदमी औरत अंग्रेजों ने किसी को नहीं बख्शा वह सब पर विस्फोट और गोलियां चलाते गए। जो बच गया उसके घर में पहुंचकर उसको मार दिया गया और जो भी आंदोलन में बैठा उसे मौत की नींद सुला दिया गया। उस समय शहीद (Essay on Bhagat Singh in Hindi) अपने स्कूल में थे जब उन्हें यह बात पता चली वह अपने बसते को छोड़कर दौड़ते हुए जलिया वाले बाग की ओर चले गए ओर वहां पहुंचकर जो उन्होंने देखा उनकी आंखें नम हो गई।

जो जलियांवाला बाग हरा भरा हर आवाजाही से व्यस्त रहता था आज वह सुनसान और भयावह लग रहा था, और लाशें बिखरी पड़ी थी कहीं किसी का शव निरंता पड़ा हुआ था तो वहीं कहीं किसी के शव पर उसके परिजन फूट-फूट कर रो रहे थे। जलिया वाले बाग की मिट्टी को देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह खून की होली खेली गई हो यह सब सोच सोच कर ही शहीद की आंखें आंसुओं की धारा से भर उठी। उनके मन में यह सवाल उठने लगा कि क्या हिंदुस्तानी होना जुर्म है क्या वे आजादी से कभी नहीं जी पाएंगे और यदि कोई उन्हें आजादी नहीं मिला पाया तो क्या वह हमेशा गुलाम बन कर रह जाएंगे। भारत हमारा देश है हम इसे ऐसे नहीं छोड़ सकते उनके मन में ऐसे ऐसे विचार आने लगे मानो आज ही वही अंग्रेजों द्वारा किए गए अत्याचारों का बदला ले लेंगे परंतु उन्होंने अपने आप को युवा होने तक प्रतीक्षा की।

भगत सिंह का युवा दौर (Bhagat Singh Youth Era)

शहीद वीर भगत सिंह बचपन से ही अपने भारत पर होते जुल्मों को देख कर बड़े होते हुए| जब युवा दौर में आए तो उन्हें कॉलेज के समय कई सारे नाटक में भूमिका निभाने का भार मिला। जब भी वे किसी नाटक में भाग लेते तो उन्हें हमेशा अंग्रेजों का किरदार मिलता जिस चीज से भगत सिंह के मन में यह बैठ गया कि जिस दिन में अंग्रेजों को दूर कर दूंगा उस दिन मेरा यह नाटक किसी कार्य नहीं आएगा और यह होकर रहेगा। भगत सिंह (Essay on Bhagat Singh in Hindi) ने बहुत सारे निबंधों की रचना की है जोकि अब भी विद्यमान है उन सब में उन्होंने केवल अपने भारत के ऊपर होते जुल्मों के बारे में विस्तार पूर्ण लिखा है जिसे पढ़कर आपको ऐसा लगे की मानो यह सब हमारी आंखों के सामने हो रहा है। युवा दौर में कदम रखते ही वे अपने देश को आजाद कराने के सपने देखने लगे धीरे-धीरे उनका मनोबल बढ़ता गया और उन में विद्रोह की भावना जागने लगी।

स्वतंत्रता में भगत सिंह का सहयोग (Bhagat Singh Coperation in Independence)

देखा जाए तो आजादी के लिए बहुत सारे क्रांतिकारियों ने अपने सहयोग दिए हैं परंतु यह कम आयु क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्होंने आजादी को ही अपना भाई बंधु पत्नी व दुनिया मान लिया था। उनके लिए आजादी सब कुछ थी बचपन से देखते आए अत्याचारों का बदला उन्हें अंग्रेजों से लेना था परंतु इसके लिए उन्हें सैन्य की आवश्यकता थी।

यदि आजादी मिल के सहयोग की बात की जाए तो इनके कारण ब्रिटिश को यह अंदाजा हो गया था कि हिंदुस्तानी यदि चाहे तो क्या नहीं कर सकते वह आजादी के लिए जान दे भी सकते हैं और जान ले भी सकते हैं। डर की भावना उनके मन में भगत सिंह द्वारा उत्पन्न की गई थी।

चंद्रशेखर से मिलाप (Meeting With Chadrashekhar Azad)

सन् 1926 मैं नौजवान भारत सभा में भगत सिंह को सेक्रेटरी बना दिया और इसके बाद सन् 1928 में उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) को ज्वाइन किया। यह आंदोलन वीर शहीद चंद्रशेखर आजाद द्वारा 28 अक्टूबर 1928 में बनाया गया था। जिसके अंतर्गत भारतीयों को सोशलिस्ट के खिलाफ आंदोलन करना था इस एसोसिएशन में वे हिंदुस्तान की सर जमी को आजाद करना चाहते थे।

इसी दौरान भगत सिंह की मित्रता आजाद से हुई परंतु आजाद को इस रिपब्लिक आंदोलन के कारण गिरफ्तार करने की घोषणा कर दी गई। आजाद का कहना था कि यदि मरो तो वीरों की मौत मरो। आजाद को जब चारों तरफ से घेर लिया गया तो उन्होंने खुद को ही एक गोली मार ली क्योंकि उनकी बंदूक में केवल एक गोली बची थी और ब्रिटिश कई सारे थे।

लाहौर वापसी:

उन ही सालों भगत सिंह जब खोजबीन के लिए ब्रिटिश के ऑफिस में थे तो गलती से उनके हाथों एक ब्रिटिश हवलदार की हत्या हो गई जिसके बाद उनके वेशभूषा को पहचानने वाले उनकी खोज करने लगे। सीख की तो अलग ही पहचान होती है। लंबे बाल लंबी दाढ़ी और कुर्ता पजामा का पोशाक भगत सिंह को पहचानना कोई कठिन कार्य नहीं था। इन्हीं दौरान शहीद राजगुरु और सुखदेव से मिल चुके थे उनकी मदद से उन्होंने लाहौर वापस जाने का फैसला किया।

लाहौर जाने के लिए उन्हें रेलगाड़ी की जरूरत होती परंतु वेशभूषा को पहचान जाने पर उनकी हत्या कर दी जाती। इसलिए उन्होंने अपने देश को बचाने के लिए अपनी बाल व दाढ़ी कटवा ली। अंग्रेजों की पोशाक पहनी और आराम से लाहौर वापस लौट आए।

भगत सिंह की गिरफ्तारी (Bhagat Singh Arrest)

अभी भगत सिंह ने आंदोलन शुरू ही किया था कि उनकी गिरफ्तारी करा दी गई। गिरफ्तारी भी कैसी खुद के द्वारा। उन दिनों कोर्ट में बटुकलाल केस की छानबीन हो रही थी। तब ही 7 अक्टूबर 1930 में अदालत में किए गए नाटकीय द्वारा भगत सिंह को गिरफ्तार किया गया। उस दिन भगत सिंह ने एक योजना बनाई जिसके अंतर्गत उन्होंने कोर्ट के खाली मैदान पर केवल आवाज करने वाली बम फेंके जो केवल आवाज करते हैं किसी को हानि नहीं पहुंचा सकते उनका मकसद क्या था कि वह अंग्रेजों को दिखा सके कि उनके जमीन पर भी आंदोलन कर सकते हैं। परंतु जब वे इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगा रहे थे तभी उन्हें अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिया और राजगुरु सुखदेव संग शहीद को जेल की और फांसी की सजा दे दी गई।

शहीद को जेल और फांसी:

भारतवासी को गिरफ्तार करना वह भी क्रांतिकारी को अंग्रेजों के लिए गर्व की बात थी। परंतु जेल में शहीद के साथ ऐसी ऐसी वेतन आएगी जो देखने व सुनने से ही भयावह लगता है। शहीद को 3 दिन तक खाना नहीं दिया जाता पानी नहीं पिलाया जाता यहां तक की उन्हें मारा और गालियां दी जाती है ताकि वे अपने हिंदुस्तान को और अपने सर जमी को छोड़ दे। परंतु भगत सिंह बचपन से ही अपने आप को भारत का अभिन्न मानते थे उन्होंने यह सब सह लिया।

अब वह दिन आ गया था जब शहीद को फांसी दी गई थी उस समय लाहौर में धारा 144 लगा दी गई थी ताकि कोई विद्रोह ना कर सके। शहीद को 23 मार्च 1931 को शाम के करीब 7:00 बजे फांसी देनी थी जोकि नियमों के खिलाफ था परंतु तब अंग्रेजों का शासन हुआ करता था कौन क्या बोलता। जब सहित फांसी के लिए चलने को कहा गया और उनकी आखिरी इच्छा पूछी तो उन्होंने कहा कि मैं जो पुस्तक अभी पढ़ रहा हूं मुझे उसको पूरा करने दिया जाए इसके बाद वह सब उन्हें उस तक पूरा होने का समय देकर चले गए। जैसे पुस्तक पूरी हुई शहीद (Essay on Bhagat Singh in Hindi) को फांसी के लिए ले गए और तीनों को एक साथ फांसी के तख्ते पर लटकाने के लिए लाया गया। तीनों मित्र मिलकर खुश हुए इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और गर्व पूर्वक फांसी के तख्ते पर लटक गए।

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Freedom Fighters in Hindi | भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी

Freedom fighters in hindi

  • Post author By Admin
  • January 24, 2022

भारत बहुत लम्बे समय तक अंग्रेजो के अधीन था, बहुत लम्बे समय तक अंग्रेजो के अधीन रहने बाद 15 अगस्त 1947 को हमारे देश को आजादी मिली।

लेकिन क्या हमें आजादी ऐसे ही मिल गयी थी, क्या इतने सालों के जुल्म को खत्म करने के लिए अंग्रेज सरकार ऐसे ही मान गयी थी। 

नहीं, अंग्रेज सरकार ने यह माना नहीं था, उन्हें हमें आजाद करने का फैसला मानना पड़ा था, क्यूंकि भारत के कईं शूरवीर लोगो ने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर दिया था। 

हम उन शूरवीरों को अब freedom fighters यानि की आज़ादी के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारी कहते है। आज हम इस freedom fighters in hindi ब्लॉग में उन्ही साहसी लोगो के बारे में बात करेंगे।

जिनके निरंतर प्रयासों और बलिदानो के बाद आज हम अपने देश में आज़ाद है और अपने अनुसार अपनी ज़िन्दगी जी सकते है।

आज़ादी की इस लड़ाई में अलग अलग लोगों ने भाग लिया, किसी ने शांति के साथ अंग्रेजो तक अपनी बात पहुंचाई तो किसी ने अपने अंदर पनपन रहे देश के लिए ज़ज़्बे के साथ अंग्रेजी हकूमत की टस तोड़ी। 

इन सब लोगों का तरीका बेशक अलग अलग हो लेकिन सबके मन में एक ही विचार था की हमें हमारे देश को आज़ादी दिलानी है।

आज हम इन्ही लोगो के बारे में बात करेंगे और कोशिश करेंगे की हम इन लोगों से प्रेरणा ले सके और ज़रूरत पड़ने पर देश हित के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर सकें। 

Table of Contents

Indian Freedom fighters in Hindi

जैसा की हमनें आपको बताया की भारत को आज़ादी दिलाने में बहुत सारे लोगों ने अपना अपना योगदान दिया, ऐसे बहुत से लोग है,

जिन्होंने इस लड़ाई में अपना योगदान दिया था लेकिन उनका नाम इतिहास के पन्नो में कहीं खो के रह गया है। 

भारत के वह शूरवीर इतने है की यह सम्भव ही नहीं है की हम उन सबका नाम अपने इस freedom fighters in hindi ब्लॉग में लिख सकें। 

लेकिन हम कोशिश करेंगे की हम अधिक से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में आपको जानकारी दे सकें। 

पर जिन जिन फ्रीडम फाइटर्स के नाम हम इस ब्लॉग में नहीं लिख पाए, course mentor की पूरी टीम उनका भी पूरा सम्मान करती है और देश के लिए दिए उनके बलदानों के लिए उनका धन्यवाद भी करती है। 

तो चलिए अब हम आपके सामने freedom fighters in Hindi लिस्ट पेश करते है -:

Mangal Pandey Ji

मंगल पाड़े का जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर पदेश के बलिया जिले के एक गाँव नगवा में हुआ था। इनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

इनके जन्म को लेकर इंतिहासकारों की अलग अलग राय है, कईं इतिहासकार इनका जन्म फैजाबाद जिले के अकबरपुर तहसील में भी बताते है। इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे और माता का नाम अभय रानी था।

इन्होंने भारत की आजादी की पहली लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी, बहुत लोग इन्हें भारत का प्रथम स्वतरंता सेनानी भी मानते है।

वह पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती हुए थे, वह सेना में पैदल सेना के सिपाही थे, जिनमें उनका सिपाही नंबर 1446 था।

1857 में जब अंग्रेजी हकूमत के खिलाफ पहली बार विद्रोह किया गया, उस विद्रोह में मंगल पांडे जी का अहम योगदान था।

1857 में हुआ यह विद्रोह ही भारत की आजादी के जंग में नींव की तरह साबित हुआ, इस विद्रोह के बाद ही भारत में आजादी के लिए लड़ाई की लहर दौड़ गई थी।

मंगल पांडे जी को इस विद्रोह की वजह से ईस्ट इंडिया कंपनी ने गद्दार घोषित कर दिया था और फिर 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी दे दी गई।

Facts about Mangal Pandey

यह है मंगल पांडे जी के बारे में कुछ अहम बातें -:

  • इन्होंने ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ पहली जंग शुरू की थी। 
  • जब वह east इंडिया कंपनी सेना में थे तो उस समय कंपनी ने सेना को गाय और सूअर के मास से बने कारतूस दिए थे, लेकिन भारत के बहुत सारे सैनिकों ने उन्हें इस्तेमाल करने से मना कर दिया था, क्यूंकी कारतूस को मुँह से छीलना पड़ता था, उस समय भारतीय हिन्दू और मुस्लिम सैनिकों ने विद्रोह किया था और मंगल पांडे जी ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया था।
  • कहा जाता है की मंगल पांडे जी अंग्रेजी हकूमत के इस फैसले पर इतना गुस्सा थे की उन्होंने अंग्रेजी Lieutenant Baugh पर गोली चला दी, गोली का निशाना तो चूक गया था, लेकिन Lieutenant को वहाँ से जान बचा कर भागना पड़ गया था।
  • इनके जीवन पर मंगल पांडे – दी राइज़ींग नाम से मूवी बन चुकी है, जिसमें आमिर खान जी ने मुख्य किरदार निभाया।

महात्मा गाँधी

Mahatma Gandhi Ji

हमारी इस freedom fighters in Hindi की लिस्ट में अगला नाम है महात्मा गांधी जी का। उनका पूरा नाम था मोहनदास कर्मचंद गांधी।

उनके पिता का नाम कर्मचंद गांधी और माता का पुतलीबाई था। उन्होंने देश को आजाद करवाने में एक बहुत अहम भूमिका निभाई।

वह एक बहुत साफ दिल और साधारण जीवन जीने वाले व्यक्ति थे, वह जो धोती पहनते थे उसके लिए सूत वह खुद चरखा चला कर कातते थे।

देश को आजाद करवाने के लिए उन्होंने कईं आंदोलन किए, वह कहीं पर भी अन्याय होता हुआ नहीं देख पाते थे। साउथ अफ्रीका में अश्वेत लोगो पर हो रहे जुल्म पर भी गांधी जी ने अपनी आवाज उठाई थी।

उनके इन योगदानों और उनके विचारों के वजह से आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व उनसे प्रेरणा लेता है। उनके अहम योगदानों की वजह से भारत में उन्हें राष्ट्रपिता कहा जाता है।

Facts about Mahatma Gandhi Ji

यह है महात्मा गांधी जी के बारे कुछ facts जो की आपको पता होने चाहिए -:

  • उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा Alfred हाईस्कूल, राजकोट से प्राप्त की थी।
  • उनके जन्म दिवस 2 अक्टूबर को पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया जाता है।
  • महात्मा गांधी जी के 2 बड़े भाई और 1 बड़ी बहन थी।
  • महात्मा गांधी जी को महात्मा का टाइटल रबिंद्रनाथ टैगोर जी ने दिया था।
  • गांधी जी को 5 बार नोबेल पीस प्राइज के लिए नॉमिनेट किया गया था, पहली बार सन 1937, 1938, 1939, 1947 और उनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले यानी की जनवरी 1948 में।

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शहीद सरदार भगत सिंह जी

Shaheed Bhagat Singh Ji

जब भी freedom fighters in Hindi की बात होती है तो सरदार भगत सिंह जी का नाम जरूर लिया जाता है।

आखिर लिया भी क्या ना जाए देश की आजादी में जो उनके योगदान है, उसके लिए पूरा भारत उनका आभारी है।

भगत सिंह जी का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था और केवल 24 वर्ष की उम्र में 23 मार्च 1931 को वो देश के लिए शहीद हो गए।

उन्हें अंग्रेजी सरकार द्वारा फांसी दे दी गई थी, भगत सिंह जी के विचार बाकी स्वतंत्रता सेनानियों से अलग थे, इसलिए अधिकतर स्वतंत्रता सेनानी उनका खुल के समर्थन नही कर पाते थे।

लेकिन भगत सिंह जी हर एक सेनानी की सोच का मान रखते थे, जिन स्वतंत्रता सेनानियो की सोच उनसे अलग थी, वह उन्हे भी पूरा सम्मान दिया करते थे।

भगत सिंह जी ने देशवासियों के मन में देश की आजादी के चिंगारी जगाने में बहुत अहम योगदान दिया।

Facts about Bhagat Singh Ji -:

यह है सरदार भगत सिंह जी से जुड़ी कुछ बातें -:

  • जब भगत सिंह जी के माता पिता उनकी शादी करवाना चाहते थे तो भगत सिंह जी ने यह कह कर घर छोड़ दिया था की अगर देश की आजादी से पहले मेरी शादी होगी तो मेरी दुल्हन केवल मौत होगी।
  • उन्होंने और बटुकेश्वर दत्त जी ने मिलकर असेंबली हॉल, दिल्ली में बम फेंके थे और इंकलाब ज़िंदाबाद के नारे लगाए थे। वहां पर बम गिराने के बाद वह भागे नही बल्कि खुद पकड़े गए थे।
  • पकड़े जाने पर उन्होंने किसी तरह का डिफेंस नही मांगा और इसे भारत में आजादी की जज्बे को फैलाने के लिए प्रयोग किया।
  • उन्हें मौत की सजा 7 अक्टूबर 1930 को सुनाई गई थी। जेल में रहते हुए उन्होंने भारतीय कैदियों और बाहरी कैदियों के बीच हो रहे भेदभाव को देखकर भूख हड़ताल कर दी थी।
  • भगत सिंह जी पर बहुत फिल्में बनी है, लेकिन उनमें से The Legend of Bhagat Singh मूवी सबसे अधिक प्रसिद्ध है, इस मूवी में अजय देवगन जी ने प्रमुख भूमिका निभाई है।

सुभाषचद्र बोस 

Subhash Chandra Ji

अगली महान शख्सियत जो की हमारी इस freedom fighters in Hindi लिस्ट में है, वह है सुभाष चंद्र बोस।

सुबास चंद्र बोस जी का जन्म 23 जनवरी 1897 में हुआ था और उनकी मृत्यु 18 अगस्त 1945 में देश की आजादी से तकरीबन 2 साल पहले हो गई थी।

सुभाष चंद्र बोस जी को सब लोग नेताजी सुभाष चंद्र बोस कहते है। उन्होंने देशवासियों को आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा दी।

उन्होंने नारा दिया था “तुम मुझे खून दो, मै तुम्हें आजादी दूंगा”। यह नारा आज भी सभी भारतीयों के दिलो में पत्थर पर लिखें अक्षरों की तरह छपा हुआ है।

सुभाष चंद्र बोस ने देश की आजादी की लड़ाई में बहुत अहम योगदान दिया।

Facts about Subhas Chandra Bos

यह है सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी कुछ बातें -:

  • सुभाष चंद्र बोस जी स्वामी विवेकानंद जी और श्री रामकृष्ण परमहंसा जी के विचारो से बहुत प्रभावित थे।
  • सुभाष चंद्र बोस जी देश की आजादी के लिए लड़ते हुए 11 बार जेल गए।
  • नेताजी ने जर्मनी में रहते हुए देश की आजादी के लिए लोगो को बहुत सपोर्ट हासिल की।
  • नेताजी की मौत आज भी एक रहस्य है, लेकिन अधिकतर लोगो का कहना है की उनकी मौत ताइवान में हुए प्लेन क्रैश के समय 18 अगस्त 1945 को हो गई थी।
  • कईं लोगों का मानना है की उनकी मौत प्लेन क्रैश में हुई थी और यह वहाँ से बचकर, अपनी पहचान छुपा कर रहने लगे थे।

चंद्रशेखर आज़ाद

Chandra Shekher Ji

चंद्रशेखर आजाद जी का जन्म 23 जुलाई 1906 को वर्तमान अलीराजपुर जिले में हुआ था, उनका नाम चंद्र शेखर तिवारी था। उन्हें आजाद और पंडित जी जैसे उपनामों से बुलाया जाता था।

वह शहीद भगत सिंह जी के साथी थे, वह 9 अगस्त 1925 को हुए काकोरी काण्ड में शामिल थे, जिसमें अंग्रेजी सरकार के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए हथियार खरीदने के लिए अंग्रेजी सरकार का ही खजाना लूट लिया गया था।

उन्होंने भगत सिंह जी के साथ मिलकर लाल लाजपत राय जी की मौत बदला लिया। उन्होंने भगत सिंह जी के असेंबली में बम फेंकने में भी सहायता की।

27 फरवरी 1931 को अंग्रेजी सरकार ने इन्हें अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया और इन्हें surrender करने का कहा, लेकिन इन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया और एक पुलिस इंस्पेक्टर को गोली मार दी।

चंद्र शेखर आजाद जी ने 5 गोलियां चलाकर, 5 लोगो की हत्या कर दी, उसके बाद उन्होंने अंतिम बची गोली खुद को मारकर आत्महत्या कर ली, इन्होने देश की आजादी के लिए देशवासियों में एक अलग ही हुंकार भर दी।

यदि कभी freedom fighters in Hindi जैसी किसी लिस्ट को पेश किया जा रहा हो और इनका नाम ना आएं, तो हम उस लिस्ट को कभी पूरा नहीं मानेंगे।

Facts about Chandra Shekhar Azad

यह है चंद्रशेखर आजाद से जुड़ी कुछ बातें -:

  • चंद्रशेखर आजाद 1921 में जब वह एक स्कूल स्टूडेंट हुए करते थे, तभी आजादी की जंग में हिस्सा लेने लगे थे।
  • इन्होंने गाँधी जी के द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में भाग लिया था, जिसकी वजह से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, जब उन्हें जज के सामने पेश किया गया तो उन्होंने वहाँ अपना नाम आजाद बातया।
  • उन्होंने जब अपने आपको आजाद नाम दिया था, उन्होंने तब यह शपथ ली थी की पुलिस उन्हें कभी जिंदा नहीं पकड़ पाएगी।
  • आजाद जी एक लाइन को बहुत बाहर दोहराया करते थे, जो की कुछ इस प्रकार है “दुश्मनों की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही थे और आजाद ही रहेंगे।”
  • इनके अपने साथी ने ही अंग्रेजों को बताया था की यह अल्फ्रेड पार्क में मोजूद है और यह वहाँ कितनी देर रहेंगे।
  • इनके जीवन पर एक मूवी बनाई गई है, जिसका नाम है शहीद चंद्रशेखर आजाद, इस मूवी में इनकी कहानी को दिखाया गया है।

रानी लक्ष्मी बाई

Rani Lakshmi Bai

हमारी इस freedom fighters in Hindi लिस्ट में अब हम एक महिला के बारे में बात करेंगे।

नीचे हमनें महिला freedom fighters in hindi के लिए एक अलग लिस्ट बनाएंगे, लेकिन हम झांसी की रानी जी के हौंसले से इतना प्रेरित है की हम उनका नाम यहां लिखें बिना नही रह पाए।

रानी लक्ष्मी बाई यानी झांसी की रानी, इनके बारे में जो कुछ भी कहा जाए कम है, इनके नाम को सुनकर ही मन में एक अलग प्रकार का होंसला उत्पन्न हो जाता है।

इनपर एक कविता भी लिखी गई है “खूब लड़ी मर्दानी, वो झांसी वाली रानी थी”।

यह कविता को हम जितनी भी बार पढ़ ले, हमारी आंखों में आसूं आ जाते है, रानी लक्ष्मी बाई के हौंसले के बारे में बात करने के हम खुद को लायक भी नहीं समझते।

इनका जन्म 19 नवंबर 1828 को हुआ था, वह झांसी राज्य की रानी थी, उनके पिता का नाम मोरोपन्त ताम्बे और माता का नाम भागीरथी सापरे था, उनका विवाह झांसी नरेश महराज गंगाधर राव नवेलकर से हुआ था।

उन्होंने 29 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ युद्ध किया, वह पूरे साहस के साथ युद्ध में लड़ी, युद्ध के दौरान ही सिर पर तलवार लगने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई, वह 18 जून 1858 को शहीद हुई थी।

Facts about Rani Lakshmi Bai

यह है रानी लक्ष्मी बाई से जुड़ी कुछ बातें -:

  • इनको इनके माता पिता ने मणिकर्णिका नाम दिया था और इन्हें प्यार से मनु कह कर बुलाया जाता था, शादी के बाद इनको रानी लक्ष्मी बाई के नाम से जाना जाने लगा।
  • उनके पिता ने उन्हीं तीरंदाजी जैसे कईं युद्ध कौशल उनको छोटी उम्र से ही सीखने लगे थे।
  • उन्होंने केवल 4 वर्ष की उम्र में ही अपनी माता को खो दिया था, उनकी माता की मृत्यु के बाद उनके पिता जी ने बड़े लाड़ प्यार से उनको पालन पोषण किया।
  • जब झांसी के महाराज यानि की उनकी पति की मृत्यु हुई तो 1853 में केवल 18 वर्ष की आयु में उन्होंने झांसी राज्य को संभालना शुरू किया।

लाल बहादुर शास्त्री

Lal Bhadur Shashtri

हमारी आज की इस freedom fighters in Hindi लिस्ट में जो अगला नाम है, वह है लाल बहादुर शास्त्री जी का।

लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने थे, उनका जन्म 2 अक्टूबर 1904 में वाराणसी में हुआ था।

उन्होंने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की,शास्त्री जी ने देश की आजादी के संघर्ष में अहम योगदान दिए।

उन्होंने देश के प्रधानमंत्री मंत्री बनने के बाद लगभग 18 महीनो तक देश की सेवा की।

लेकिन फिर 11 जनवरी 1966 को सोवियत संघ रूस में इनकी मृत्यु हो गई।

Facts about Lal Bahadur Shashtri

यह है लाल बहदूर शास्त्री से जुड़ी कुछ बातें -:

  • लाल बहादुर शास्त्री जी के पिता की मृत्यु तभी हो गई थी, जब वह केवल डेढ़ साल के थे।
  • उनके पिता की मृत्यु के बाद उनकी माता जी अपने तीन बच्चों के साथ अपने पिता यानि की शास्त्री जी के नाना जी के घर चले गए, शास्त्री जी का पालन पोषण फिर वहीं पर हुआ।
  • उन्होंने वाराणसी से हाई स्कूल की शिक्षा प्राप्त की, जहां पर वह नंगे पाँव कईं किलोमीटर दूर अपने स्कूल जाया करते थे।
  • यह गाँधी जी के विचारों से बहुत प्रेरित थे और कमाल के इत्तेफाक की बात है की इनका जन्मदिवस भी गाँधी जी के साथ ही आता है।
  • इनकी मौत को बहुत लोग रहस्यमयी मानते है, इनकी मौत के स्पष्टीकरण पर सवाल उठाते हुए The Tashkent Files नाम की एक मूवी भी बनी है।

List of Some Other Freedom Fighters in Hindi

हमारे देश को आजाद करवाने में इतने लोगों ने अहम योगदान दिया है की उन सब का नाम यहाँ बता पान बहुत मुश्किल है। 

फिर भी हम पूरी कोशिश कर रहे है की आपको अधिक से अधिक लोगों के बारे में बता सकें, तो यह रहीं कुछ ओर freedom fighters in Hindi की लिस्ट -:

Woman Indian Freedom Fighters in Hindi

यह रहीं कुछ महिला freedom fighters in Hindi, जिन्होंने हमारे देश को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

Essay on Freedom Fighters in Hindi

बहुत सारे लोगो ने हमें आज़ादी दिलाने के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए, हम देश के लिए उनके किये बलिदानो के लिए सदा उनके आभारी रहेंगे। 

अधिकतर सेनानी तो ऐसे है जिन्होंने जिस आज़ादी के लिए अपने प्राण भी दे दिए, उन्हें वह आज़ादी देखने के लिए भी नहीं मिली।

उन्होंने हमारे लिए इतना सब कुछ किया है तो यह हमारी ज़िम्मेदारी बनती है की हम उनके आज इस दुनिया में ना होने के बावजूद हमेशा उनको याद रखें। 

हमें उन्हें हमारे दिलो में हमेशा के लिए ज़िंदा रखना है, तो ऐसे में सब यह चाहते है की आने वाली पढियाँ भी उन्हें हमेशा याद रखें। 

आने वाली भी पढियाँ भी यह समझे की जिस हवा में वह सांस ले रहे है, उस हवा में हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और ज़ज़्बे की महक है।

ताकि आने वाली पढियाँ भी उन्हें याद रखें इसलिए स्कूलो, कॉलेजों में freedom fighters in hindi पर निबंध लिखवाये जाते है। 

हम भी इस ब्लॉग में एक निबंध हमारे स्वतंत्रता सेनानियों पर लिख रहे है ताकि आप उनके बलिदानो को और अच्छे से समझ सकें। 

Indian Freedom Fighters in Hindi

भारत बहुत सालों तक अंग्रेजो की क्रूरता को सहता रहा और उनके अधीन रहा, लेकिन 15 अगस्त 1947 को हमारे देश को आज़ादी मिली। 

लेकिन यह आज़ादी ऐसे ही नहीं मिली बहुत लोगो बलिदानो के बाद हमें यह आज़ादी मिली, वो लोग जो की देश की आज़ादी के लिए लड़े, वह थे हमारे freedom fighters यानि की स्वतंत्रता सेनानी।

बहुत सारे स्वतंत्रता सेनानियों के प्रयासों के बाद जा कर हमें यह आज़ादी मिली है, उन लोगों ने लगातार अंग्रेजी हकूमत के खिलाफ अपनी आवाज़ उठायी। 

जिसकी वजह से उनमें से कईं को जेल जाना पड़ा, कई लोगो की हत्या कर दी गयी और कईं लोगो को बुरी तरह से प्रताड़ित किया। 

लेकिन इसके बावजूद हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने हार नहीं मानी, उन्होंने उनके सामने आयी हर चुनौती का सामना किया, अंग्रेजी हकूमत के खिलाफ होने के वजह से उनपर कईं तरह के ज़ुल्म भी किये गए। 

पकडे जाने पर उन लोगो के साथ जानवरो से भी बुरा सुलूक किया जाता था। लेकिन उन सब के मन में एक ही बात थी की उन्हें अपने देश को आज़ाद कराना है।

इसलिए उन्होंने उन पर हुए हर ज़ुल्म का सामना किया और देश के लिए लड़े, वह भी हमारे जैसे आम नागरिक ही थे, लेकिन उनमें एक ज़ज़्बा था की वह अपने देश के लिए कुछ करेंगे। 

उनमें से बहुत लोगो को लड़ना नहीं आता था, लेकिन वह लोग फिर भी जंग में उतरे, उनमें से कहीं शारीरक रूप से ताक़तवर नहीं थे, लेकिन उनके हौसले के आगे शक्तिशाली से शकितशाली व्यक्ति भी हार जाता था।

वह सब लोग एक जैसे नहीं थे, उनमें असमानताएं थी लेकिन एक चीज़ जो समान करती थी, वह थी उनका देश के लिए प्यार और देश को आज़ादी दिलाने का उनका ज़ज़्बा। 

वह अपने से ऊपर अपने देश को मानते थे, इसलिए असामनातये होने के बावजूद भी वह लोग एक साथ एक जुट होकर अंग्रेजो के खिलाफ लड़े और उन्होंने हमारे देश को आज़ादी दिलाई। 

हमें हमारे स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा लेनी चाहिए और समझना चाहिए की व्यक्ति का सम्प्रदायिकता नहीं समझना चाहिए, इन सब से ऊपर एक चीज़ होती है वह है देश। 

देश से ऊपर कोई धर्म नहीं होता और ना ही कोई जात होती है, इसलिए हम सब को एक जुट होकर रहना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए की कैसे हम अपने देश के हित में काम आ सकते है।

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Conclusion about Freedom Fighters in Hindi

तो यह था आज का ब्लॉग “Freedom fighters in Hindi” के बारे में। 

हमें उम्मीद है की आपको आज का यह ब्लॉग पसंद आया होगा, इसमें हमें आपको हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानकारी दी। 

हमारे देश को आज़ादी के लिए बहुत अधिक लोगो ने अपने बलिदान दिए है, उनकी वजह से ही हम आज इस आज़ाद देश में जी रहे है। 

हमें उनके बलिदानों को हमेशा याद रखना चाहिए और हमेशा उन्हीं अपने दिलो में ज़िंदा रखना है। 

तो इसी के साथ आज के ब्लॉग में इतना ही, ऐसे ही ओर ब्लॉग्स को पढ़ने के लिए आप course mentor से जुड़ें रहें। 

FAQ about Freedom Fighters in Hindi

फ्रीडम फाइटर को हिंदी में क्या बोलते हैं.

फ्रीडम फाइटर को हिंदी में स्वतंत्रता सेनानी कहते  है, यानि की ऐसे लोग जिन्होने देश को आज़ादी दिलाने के लिए क्रांति की हो, उन लोगो को फ्रीडम फाइटर कहा जाता है। महात्मा गाँधी जी, भगत सिंह जी जैसे बहुत से लोग हमारे फ्रीडम फाइटर है।

भारत में प्रथम स्वतंत्रता सेनानी कौन है?

भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे जी को कहा जाता है, वह अंग्रेजी सेना में एक सिपाही थे। 1857 में जब अंग्रेजो के खिलाफ भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ था, उस संग्राम में इन्होने बहुत भूमिका निभाई थी। 

देश आजाद कराने में कौन कौन थे?

भारत को आज़ाद कराने में किसी एक व्यक्ति का हाथ नहीं था, बहुत सारे लोगो के निरंतर प्रयास के बाद भारत को आज़ादी मिली, लेकिन जिन्होंने इस लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी उनमें से कुछ लोग इस प्रकार है -: 1. मंगल पांडे 2. सरदार भगत सिंह 3. महात्मा गाँधी जी 4. सुभाषचंद्र बोस 5. चंद्रशेखर आज़ाद। 

  • Tags freedom fighters in hindi , indian freedom fighters

freedom fighter bhagat singh essay in hindi

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भगत सिंह पर निबंध – Bhagat Singh Essay in Hindi

by StoriesRevealers | Jun 4, 2020 | Essay in Hindi | 0 comments

bhagat singh essay in hindi

Bhagat Singh Essay in Hindi : उन्हें हम सभी भारतीयों द्वारा शहीद भगत सिंह के नाम से जाना जाता है। वह एक उत्कृष्ट और अप्राप्य क्रांतिकारी थें। उनका का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के दोआब जिले में एक संधू जाट परिवार में हुआ था। वह बहुत कम उम्र में स्वतंत्रता के संघर्ष में शामिल हो गए और केवल 23 वर्ष की आयु में देश के लिए शहीद हो गए।

Bhagat Singh Essay in Hindi

bhagat singh essay in hindi

भगत सिंह बचपन के दिन

भगत सिंह अपने वीर और क्रांतिकारी कृत्यों के लिए लोकप्रिय हैं। उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में पूरी तरह शामिल था। उनके पिता, सरदार किशन सिंह और चाचा, सरदार अजीत सिंह दोनों उस समय के लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे। दोनों गांधीवादी विचारधारा का समर्थन करने के लिए जाने जाते थे।

उन्होंने हमेशा लोगों को अंग्रेजों का विरोध करने के लिए जनता के बीच आने का निर्णय किया। इससे भगत सिंह गहरे प्रभावित हुए। इसलिए, देश के प्रति निष्ठा और इसे अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करने की इच्छा भगत सिंह में जन्मजात थी। यह उसके खून और नसों में दौड़ रहा था।

भगत सिंह की शिक्षा

उनके पिता महात्मा गांधी के समर्थन में थे और बाद में जब सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों का बहिष्कार करने का आह्वान किया गया। तब, भगत सिंह ने 13. वर्ष की आयु में स्कूल छोड़ दिया और फिर उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में प्रवेश लिया। कॉलेज में, उन्होंने यूरोपीय क्रांतिकारी आंदोलनों का अध्ययन किया जिससे उन्हें काफी प्रेरणा मिली। 

स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह की भागीदारी

भगत सिंह ने यूरोपीय राष्ट्रवादी आंदोलनों के बारे में कई लेख पढ़े। जिसके कारण वह 1925 में स्वतंत्रा आंदोलन के लिए प्रेरित हुऐ। उन्होंने अपने राष्ट्रीय आंदोलन के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की। बाद में वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल हो गए। जहाँ वह सुखदेव, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद जैसे कई प्रमुख क्रांतिकारियों के संपर्क में आए।

उन्होंने कीर्ति किसान पार्टी की पत्रिका के लिए भी योगदान देना शुरू किया। हालाँकि उनके माता-पिता चाहते थे कि वे उस समय शादी करें, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने उनसे कहा कि वह अपना जीवन पूरी तरह से स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित करना चाहते हैं।

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विभिन्न क्रांतिकारी गतिविधियों में इस भागीदारी के कारण, वह ब्रिटिश पुलिस के लिए रुचि के व्यक्ति बन गए। इसलिए पुलिस ने मई 1927 में उसे गिरफ्तार कर लिया। कुछ महीनों के बाद, उसे जेल से रिहा कर दिया गया और फिर से उसने खुद को समाचार पत्रों के लिए क्रांतिकारी लेख लिखने में शामिल कर लिया।

भगत सिंह के लिए महत्वपूर्ण मोड़

ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों के लिए स्वायत्तता पर चर्चा करने के लिए 1928 में साइमन कमीशन का आयोजन किया। लेकिन कई राजनीतिक संगठनों द्वारा इसका बहिष्कार किया गया क्योंकि इस आयोग में किसी भी भारतीय प्रतिनिधि को शामिल नहीं किया गया था।

लाला लाजपत राय ने उसी का विरोध किया और एक जुलूस का नेतृत्व किया और लाहौर स्टेशन की ओर मार्च किया। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। लाठीचार्ज के कारण पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को बेरहमी से मारा। लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। कुछ हफ्तों के बाद लाला जी शहीद हो गए।

इस घटना ने भगत सिंह को नाराज कर दिया और इसलिए उन्होंने लाला जी की मौत का बदला लेने की योजना बनाई। इसलिए, उन्होंने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी सॉन्डर्स की हत्या कर दी। बाद में उन्होंने और उनके सहयोगियों ने दिल्ली में केंद्रीय विधान सभा पर बमबारी की। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और भगत सिंह ने इस घटना में अपनी संलिप्तता स्वीकार कर ली।

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परीक्षण अवधि के दौरान, भगत सिंह ने जेल में भूख हड़ताल की। उन्हें और उनके सह-षड्यंत्रकारियों, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को फासी दे दी गई।

भगत सिंह वास्तव में एक सच्चे देशभक्त थे। न केवल उन्होंने देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी बल्कि इस घटना में अपनी जान तक दे दी। उनकी मृत्यु ने पूरे देश में उच्च देशभक्ति की भावनाएं पैदा कीं। उनके अनुयायी उन्हें शहीद मानते थे। हम आज भी उन्हें शहीद भगत सिंह के रूप में याद करते हैं।

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Freedom Fighter Bhagat Singh Essay In Hindi | भगत सिंह पर निबंध 2024

अगर आपके बच्चे के स्कूल में भगत सिंह पर निबंध (Freedom Fighter Bhagat Singh Essay In Hindi) लिखने के लिए कहा गया है और आप भगत सिंह पर निबंध सर्च कर रहे है तो आप बिलकुल सही पेज पर पहुँच गए है। चलिए अब हम आपको भगत सिंह पर निबंध के बारे में जानकारी उपलब्ध करा रहे है

Freedom Fighter Bhagat Singh Essay In Hindi

Table of Contents

भगत सिंह पर निबंध (Freedom Fighter Bhagat Singh Essay In Hindi)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा भगत सिंह का नाम विशेष गर्व और सम्मान के साथ याद किया जाता है। उनकी शौर्यगाथा, निष्ठा, और देशप्रेम ने उन्हें एक अद्वितीय राष्ट्रनायक बना दिया। इस निबंध में, हम भगत सिंह के उद्दीपक जीवन से उनके महत्वपूर्ण क्षणों को छूने का प्रयास करेंगे, जिससे हमें एक सशक्त राष्ट्रनायक के प्रति आदर और समर्पण की भावना मिलेगी।

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय

भारत के युवा क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह का जन्म पाकिस्तान में मौजूद पंजाब के लायलपुर जिले के बाँध गाँव में 28 सितम्बर 1907 ई. में हुआ था। भगत सिंह के पिता का नाम किशन सिंह और माता जी का नाम विद्यावती था। इनके परिवार में देशभक्ति की भावना बहुत ज्यादा थी, इसीलिए भगत सिंह को देशभक्ति और क्रान्ति की भावना विरासत में मिली थी। इनके पिता, चाचा और दादी में राष्ट्रीयता की भावना होने के कारण भगत सिंह भी बचपन में ही वीर, निडर, साहसी और देशभक्त बन गए थे।

भगत सिंह की प्रारंभिक शिक्षा

भगत सिंह ने अपने गाँव के सरकारी स्कूल से अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण की थी। प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के उन्होंने डी. ए. वी. कॉलेज से वर्ष 1917 में हाईस्कूल की परीक्षा पास की। उसके बाद भगत सिंह ने नेशनल कॉलेज से बी. ए और एफ. ए. की परीक्षा पास की थी। पढाई के साथ साथ वह कई सारे देशभक्ति संगठनों में शामिल रहे थे।

चंद्रशेखर आजाद के साथ बनाई पार्टी

भगत सिंह ने देश के लिए नौजवान संस्थान की स्थापना भी की थी, उसी समय पर-पर प्रसिद्ध कुकरी कांड हुआ था। कूकरी कांड में शामिल राम प्रसाद बिस्मिल और उनके साथ चार महान क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई, इसके अलावा इस कांड में शामिल अन्य 16 क्रान्तिकारियो को करावास की सजा दी गई। इस घटना ने भगत सिंह को बहुत ज्यादा परेशान और क्रोध से भर दिया, फिर वह चंद्रशेखर आजाद से मिले और आजाद की पार्टी हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ जुड़ गए। कुछ समय बाद आजाद की पार्टी का नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएश रख दिया गया।

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लाला लाजपत राय की मौत का बदला

ब्रिटिश शासन के विरोध में भारत में अनेको आंदोलन हुए थे, वर्ष 1928 में साइमन कमीशन का बहिष्कार करने के लिए बहुत भयानक विरोध प्रदर्शन किया गया था। इस विरोध प्रदर्शन में भगत सिंह के दोस्त लाला लाजपत राय ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। ब्रिटिश शासन ने प्रदर्शन करने वाले सभी क्रांतिकारियो को भगाने के लिए लाठीचार्ज की गई, जिसमे अनेको क्रांतिकारियो को काफी गहरी चोटें आई। लाला लाजपत राय के सिर में लाठी लगने से उनकी मृत्यु हो गई थी।

भगत सिंह को जब इस घटना की जानकारी हुई तो वह बहुत ज्यादा क्रोधित हो गए और उन्होंने लाला की मौत का बदला लेने का निर्णय लिया। भगत सिंह ने लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए एक योजना बनाई, योजना के तहत भगत सिंह ने पुलिस सुपरिटेंडेंट मारने का फैसला किया। अपनी इस योजना में भगत सिंह ने राज गुरु को भी साथ में लिया, फिर दोनों ने 17 दिसम्बर 1928 को एसपी सांडर्स की गोली मार कर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया था।

भगत सिंह की गिरफ्तारी

जलियांवाला बाग हत्याकांड और लाला लाजपतराय की मृत्यु से भगत सिंह को गहरा आघात पहुँचा। भगत सिंह से ब्रिटिश क्रूरता सहन नहीं हो पा रही थी, इसीलिए उन्होंने देश की जनता को जगाने का निर्णय लिया। भगत सिंह ने अपने चार साथियो के साथ संसद पर हमला करके गिरफ्तार होने का निर्णय लिया। उसके बाद भगत सिंह ने अपने साथियो के साथ विधानसभा सत्र के दौरान केंद्रीय संसद में बम फेंके, हालाँकि इन बम धमाकों में किसी प्रकार नुक्सान नहीं हुआ। उसके बाद ब्रिटिश शासन ने भगत सिंह और उनके साथियो को गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तार होने के बाद भगत सिंह और उनके साथियो को कोर्ट में पेश किया गया। भगत सिंह ने कोर्ट में सुनवाई के दौरान बम बनाने के बारे में भी बताया। दरसल भगत सिंह चाहते थे की बम बनाने के तरीके के बारे में देश के अधिक से अधिक लोग जाने। कोर्ट में भगत सिंह और उनके चारो साथियो को दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

भगत सिंह की मृत्यु

भगत सिंह को सजा मिलने के बाद देश में क्रांति की लहार दौड़ गई, पूरे देश में ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन तेज होने लगें। बढ़ते आंदोलन को देख ब्रिटिश शासन डरने लगा ऐसे में ब्रिटिश शासन ने भगत सिंह और उनके साथियो को फांसी देने का निर्णय लिया। ब्रिटिश शासन ने नियमों के विरुद्ध 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा दे दी गयी। फांसी के समय पर सभी क्रांतिकारियो के चेहरे पर जरा-सा भी मृत्यु का भय नहीं था। उसके बाद आजादी के दीवाने ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ बोलते और हँसते हुए फांसी पर झूल गए।

ब्रिटिश शासन को पता था कि फांसी की खबर सुनने के बाद देश में क्रांति आ सकती है, इसीलिए ब्रिटिश शासन ने इन सभी के शरीर के छाए छोटे टुकड़ो में काट कर नदी में फेंक दिया था। भगत सिंह की मृत्यु की खबर देशवासियो को मिली तो पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई थी।

इस निबंध के माध्यम से हमने देखा कि भगत सिंह, एक सशक्त राष्ट्रनायक और अद्वितीय क्रांतिकारी थे, जिनकी शौर्यगाथा और देशप्रेम ने उन्हें आदर्श बना दिया। उनका जीवन एक योद्धा की भूमिका में सजीव हो उठा और उनकी बलिदानी मृत्यु ने देशभक्ति की नई ऊचाइयों की ओर पथ प्रदर्शित किया। भगत सिंह की शौर्यगाथा ने देश के युवाओं को सजग और साहसी बनाने का संदेश दिया, जिसे हमें सदैव याद रखना चाहिए। उनका आदर और समर्पण हमें अपने देश के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने का प्रेरणा स्रोत प्रदान करता है। इस प्रकार, भगत सिंह की शौर्यगाथा हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम की महक को हमारी यादों में सजीव रखती है।

ऊपर हमने आपको भारत के महान क्रांतिकारी भगत सिंह पर निबंध (Freedom Fighter Bhagat Singh Essay In Hindi) के बारे में जानकारी दी है। हम उम्मीद करते है कि आपको हमारे लेख में दी गई जानकारी पसंद आई हो तो इस लेख को अधिक से अधिक शेयर करके ऐसे बच्चो के पेरेंट्स तक पहुँचाने में मदद करें जिन्हे भगत सिंह पर निबंध लिखना हो।

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Bhagat Singh Essay for Students and Children

500+ Words Essay on Bhagat Singh

He is referred to as Shaheed Bhagat Singh by all Indians. This outstanding and unmatchable revolutionary was born on the 28th of September, 1907 in a Sandhu Jat family in Punjab’s Doab district. He joined the struggle for freedom at a very young age and died as a martyr at the age of only 23 years.

bhagat singh essay

Childhood Days:

Bhagat Singh is popular for his heroic and revolutionary acts. He was born in a family that was fully involved in the struggle for Indian Independence . His father, Sardar Kishan Singh, and uncle, Sardar Ajit Singh both were popular freedom fighters of that time. Both were known to support the Gandhian ideology.

They always inspired the people to come out in masses to oppose the British. This affected Bhagat Singh deeply. Therefore, loyalty towards the country and the desire to free it from the clutches of the British were inborn in Bhagat Singh. It was running in his blood and veins.

Bhagat Singh’s Education:

His father was in support of Mahatma Gandhi at and when the latter called for boycotting government-aided institutions. So, Bhagat Singh left the school at the age of 13. Then he joined the National College at Lahore. In college, he studied the European revolutionary movements which inspired him immensely.

Bhagat Singh’s Participation in the Freedom Fight:

Bhagat Singh read many articles about the European nationalist movements . Hence he was very much inspired by the same in 1925. He founded the Naujavan Bharat Sabha for his national movement. Later he joined the Hindustan Republican Association where he came in contact with a number of prominent revolutionaries like Sukhdev, Rajguru and Chandrashekhar Azad.

He also began contributing articles for the Kirti Kisan Party’s magazine. Although his parents wanted him to marry at that time, he rejected this proposal. He said to them that he wanted to dedicate his life to the freedom struggle completely.

Due to this involvement in various revolutionary activities, he became a person of interest for the British police. Hence police arrested him in May 1927. After a few months, he was released from the jail and again he involved himself in writing revolutionary articles for newspapers.

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The Turning Point for Bhagat Singh:

The British government held the Simon Commission in 1928 to discuss autonomy for the Indians. But It was boycotted by several political organizations because this commission did not include any Indian representative.

Lala Lajpat Rai protested against the same and lead a procession and march towards the Lahore station. Police used the Lathi charge to control the mob. Because of Lathi charge police brutally hit the protestors. Lala Lajpat Rai got seriously injured and he was hospitalized. After few weeks Lala Ji became shaheed.

This incident left Bhagat Singh enraged and therefore he planned to take revenge of  Lala Ji’s death. Hence, he killed British police officer John P. Saunders soon after. Later he and his associates bombed the Central Legislative Assembly in Delhi. Police arrested them, and Bhagat Singh confessed his involvement in the incident.

During the trial period, Bhagat Singh led a hunger strike in the prison. He and his co-conspirators, Rajguru and Sukhdev were executed on the 23rd of March 1931.

Conclusion:

Bhagat Singh was indeed a true patriot . Not only he fought for the freedom of the country but also he had no qualms giving away his life in the event. His death brought high patriotic emotions throughout the country. His followers considered him a martyr. We still remember him as Shaheed Bhagat Singh.

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  • Bharat ka Itihaas (Indian History in Hindi) /

महान भारतीय स्वतंत्रता सैनानी

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  • Updated on  
  • अगस्त 5, 2023

Indian Freedom Fighters

लगभग 76 साल पहले, 15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक तारीख को, भारत ब्रिटिश प्रभुत्व से मुक्त हो गया। यहां कई आंदोलनों और संघर्षों की परिणति थी जो 1857 के ऐतिहासिक विद्रोह सहित ब्रिटिश शासन के समय में व्याप्त थे। यह स्वतंत्रता कई क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों के प्रयासों के माध्यम से हासिल की गई थी, जिन्होंने इस संघर्ष को आयोजित करने का बीड़ा उठाया जिसके कारण भारत की स्वतंत्रता हुईं। हालांकि वे सभी विभिन्न विचारधाराओं के थे, लेकिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को हर भारतीय के दिल में अमर कर दिया। Indian Freedom Fighters in Hindi (स्वतंत्रता सेनानी) के बारे में अधिक जानने के लिए इस ब्लॉग को अंत तक जरूर पढ़ें।

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भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, महत्वपूर्ण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और उनके योगदान, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, दादा भाई नौरोजी, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, राजा राम मोहन रॉय, तात्या टोपे, बाल गंगाधर तिलक, अशफाकउल्ला खान , सी. राजगोपालाचारी, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हज़रत महल, सरोजिनी नायडू, सावित्रिभाई फुले, विजयलक्ष्मी पंडित, भारतीय स्वतंत्रता सैनानीयों द्वारा कोट्स.

भारत से अंग्रेजों को बाहर करने के संघर्ष में देश के हर कोने के लोगों ने भाग लिया। उनमें से कई क्रांतिकारियों ने भारत को अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से मुक्त करने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। आइए जानते हैं कुछ महान हस्तियों के बारे में विस्तार से।

  • दादाभाई नौरोजी
  • टांटिया टोपे
  • के. एम. मुंशी
  • अशफाकला खान
  • रानी लक्ष्मी बाई
  • चितरंजन दास
  • बेगम हजरत महल
  • चंद्र शेखर आज़ाद
  • अब्दुल हाफिज मोहम्मद बाराकतुल्लाह

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Indian Freedom Fighters in Hindi पर आधारित इस ब्लॉग में कुछ महत्वपूर्ण भारतीय स्वतंत्रता सेनानीयों के नाम और उनके योगदान निम्नलिखित हैं-

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भारतीय स्वतंत्रता सेनानीयों के बारे में

आइए नीचे Indian Freedom Fighters in Hindi (स्वतंत्रता सेनानी) के बारे में विस्तार से जानते हैं:-

महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी था। मोहनदास की माता का नाम पुतलीबाई था जो करमचंद गांधी जी की चौथी पत्नी थीं। मोहनदास अपने पिता की चौथी पत्नी की अंतिम संतान थे। महात्मा गांधी को ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेता और ‘राष्ट्रपिता’ माना जाता है। महात्मा गांधी Indian Freedom Fighters in Hindi मे से एक महान व्यक्ति थे।

महात्मा गांधी के बारे में 10 रोचक तथ्य 

  • गांधी जी की मातृभाषा गुजराती थी।
  • गांधी जी ने अल्फ्रेड हाई स्कूल, राजकोट से पढ़ाई की थी
  • गांधी जी का जन्मदिन 2 अक्टूबर ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस ‘ के रूप में विश्वभर में मनाया जाता है।
  • महात्मा गांधी जी अपने माता-पिता के सबसे छोटी संतान थे उनके दो भाई और एक बहन थी।
  • उनके  पिता धार्मिक रूप से हिंदू तथा जाति से मोध बनिया थे।
  • माधव देसाई, गांधी जी के निजी सचिव थे।
  • उनकी हत्या बिरला भवन के बगीचे में हुई थी।
  • गांधी जी और प्रसिद्ध लेखक लियो टोलस्टोय के बीच लगातार पत्र व्यवहार होता था।
  • गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह संघर्ष के दौरान , जोहांसबर्ग से 21 मील दूर एक 1100 एकड़ की छोटी सी कालोनी, टॉलस्टॉय फार्म स्थापित की थी।  
  • 1930 में, उन्होंने दांडी साल्ट मार्च का नेतृत्व किया और 1942 में, उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ चलाया।

हमारे देश के एक महान Indian Freedom Fighters in Hindi (स्वतंत्रता सेनानी) नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था, उनके पिताजी कटक शहर के मशहूर वकील थे। सुभाष चंद्र बोस कुल 14 भाई बहन थे। सुभाष चंद्र बोस एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे। ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा’ उन्होंने ही यह प्रसिद्ध नारा भारत को दिया। जिससे भारत के कई युवा वर्ग भारत से अंग्रेजों को बाहर निकालने की लड़ाई लड़ने के लिए प्रेरित हुए। नेताजी ने चितरंजन दास के साथ काम किया जो बंगाल के एक राजनीतिक नेता, शिक्षक और बंगलार कथा नाम के बंगाल सप्ताहिक में पत्रकार थे। बाद में वो बंगाल कांग्रेस के वालंटियर कमांडेंट, नेशनल कॉलेज के प्रिंसीपल, कलकत्ता के मेयर और उसके बाद निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रुप में नियुक्त किये गये।

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सुभाष चंद्र बोस द्वारा बोले गए अनमोल वचन

  • “तुम मुझे खून दो ,मैं तुम्हें आजादी दूंगा !”
  • “ये हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी स्वतंत्रता का मोल अपने खून से चुकाएं। हमें अपने बलिदान और परिश्रम से जो आज़ादी मिलेगी,  हमारे अन्दर उसकी रक्षा करने की ताकत होनी चाहिए”
  • “आज हमारे अन्दर बस एक ही इच्छा होनी चाहिए, मरने की इच्छा ताकि भारत जी सके! एक शहीद की मौत मरने की इच्छा ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशश्त हो सके”
  • “मुझे यह नहीं मालूम की स्वतंत्रता के इस युद्ध में हममे से कौन कौन जीवित बचेंगे ! परन्तु में यह जानता हूँ ,अंत में विजय हमारी ही होगी !”
  • “राष्ट्रवाद मानव जाति के उच्चतम आदर्श सत्य, शिव और सुन्दर से प्रेरित है “
  • “भारत में राष्ट्रवाद ने एक ऐसी सृजनात्मक शक्ति का संचार किया है जो सदियों से लोगों के अन्दर से सुसुप्त पड़ी थी”
  • “मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश की प्रमुख समस्यायों जैसे गरीबी ,अशिक्षा, बीमारी, कुशल उत्पादन एवं   वितरण का समाधान सिर्फ समाजवादी तरीके से ही किया जा सकता है”
  • “यदि आपको अस्थायी रूप से झुकना पड़े तब वीरों की भांति झुकना !”
  • “समझोतापरस्ती बड़ी अपवित्र वस्तु है !”
  • “मध्या भावे गुडं दद्यात — अर्थात जहाँ शहद का अभाव हो वहां गुड से ही शहद का कार्य निकालना चाहिए !”

सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को नादिद ग्राम में हुआ था, जिन्होंने Indian Freedom Fighters in Hindi बनके अंग्रेजों को देश से भगाया था। उनके पिता झवेरभाई पटेल एक साधारण किसान और माता लाड बाई एक साधारण महिला थी। बचपन से ही पटेल कड़ी महेनत करते आए थे, बचपन से ही वे परिश्रमी थे। उन्होंने 1896 में अपनी हाई-स्कूल परीक्षा पास की। स्कूल के दिनों से ही वे होशियार थे। भारत माता की स्वतंत्रता की लड़ाई में उनका महत्वपूर्ण योगदान था इसी वजह से उन्हें भारत का ‘लौह पुरुष’ कहा जाता है। सरदार वल्लभ भाई पटेल जी ने अपने जीवन में महात्मा गाँधी जी से प्रेरणा ली थी और स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेकर अपना योगदान दिया था। हमारे भारत के इतिहास में सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। भारत हमेशा इस महान, साहसी, निडर, निर्भयी, दबंग, अनुशासित, अटल महान पुरुष को याद रखेगा।

प्रमुख विचार

  • जीवन की डोर तो ईश्वर के हाथ में है, इसलिए चिंता की कोई बात हो ही नहीं सकती
  • कठिन समय में कायर बहाना ढूंढ़ते हैं बहादुर व्यक्ति रास्ता खोजते हैं
  • उतावले उत्साह से बड़ा परिणाम निकलने की आशा नहीं रखनी चाहिये
  • हमें अपमान सहना सीखना चाहिए
  • बोलने में मर्यादा मत छोड़ना, गालियाँ देना तो कायरों का काम है
  • शत्रु का लोहा भले ही गर्म हो जाये, पर हथौड़ा तो ठंडा रहकर ही काम दे सकता है
  • आपकी अच्छाई आपके मार्ग में बाधक है, इसलिए अपनी आंखें को क्रोध से लाल होने दीजिये, और अन्याय का मजबूत हाथों से सामना कीजिये

जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को ब्रिटिश भारत में इलाहाबाद में हुआ। उनके पिता, मोतीलाल नेहरू (1861–1931), एक धनी बैरिस्टर जो कश्मीरी पण्डित समुदाय से थे, स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष चुने गए। उनकी माता स्वरूपरानी (1868–1938), जो लाहौर में बसे एक सुपरिचित कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थी, मोतीलाल की दूसरी पत्नी थी व पहली पत्नी की प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई थी। जवाहरलाल तीन बच्चों में से सबसे बड़े थे, जिनमें बाकी दो लड़कियाँ थी। बड़ी बहन, विजया लक्ष्मी, बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनी। सबसे छोटी बहन, कृष्णा हठीसिंग, एक उल्लेखनीय लेखिका बनी और उन्होंने अपने भाई पर कई पुस्तकें लिखी। जवाहरलाल नेहरु जी को 1955 में ‘भारत रत्न’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जवाहरलाल नेहरू जी को पंडित नेहरू और चाचा नेहरू भी कहा जाता है, साथ ही में उन्हें आधुनिक भारत का शिल्पकार भी कहा जाता है। जवाहरलाल नेहरु जी को सभी बच्चे चाचा नेहरू कहा करते थे, इस वजह से जवाहरलाल नेहरू जी के जन्मदिन 14 नवंबर को हर वर्ष ‘बाल दिवस’ मनाया जाता है।

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को मुगलसराय, उत्तरप्रदेश में ‘मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव’ के यहां हुआ था। उनकी माता का नाम ‘रामदुलारी’ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। ऐसे में सब उन्हें ‘मुंशी जी’ ही कहते थे। लाल बहादुर शास्त्री जी भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। शास्त्री जी ने ‘ जय जवान ,जय किसान’ का नारा दिया था। 1965 का भारत पाकिस्तान युद्ध शास्त्रीजी के कार्यकाल में लड़ा और जीता गया था। 11 जनवरी 1966 की रात को ताशकंत में शास्त्री जी की संदिग्ध मृत्यु हो गई थी। शास्त्री जी के समाधि स्थल का नाम ‘विजय घाट’ है।

लाल बहादुर शास्त्री जी के अनमोल विचार

  • हम शांति और शांतिपूर्ण विकास में विश्वास करते हैं, न केवल अपने लिए बल्कि दुनिया भर के लोगों के लिए।
  • शासन का मूल विचार, जैसा कि मैं इसे देखता हूं, समाज को एक साथ रखना है ताकि यह निश्चित लक्ष्यों की ओर विकसित हो सके और मार्च कर सके।
  • भारत को अपना सिर शर्म से झुकाना पड़ेगा, अगर एक भी ऐसा व्यक्ति बचा हो जिसे अछूत कहा जाए।
  • हम दुनिया में सम्मान तभी जीत सकते हैं जब हम आंतरिक रूप से मजबूत होंगे और अपने देश से गरीबी और बेरोजगारी को दूर कर सकते हैं।
  • हमारे देश की अनोखी बात यह है कि हमारे पास हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी और अन्य सभी धर्मों के लोग हैं। हमारे पास मंदिर और मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च हैं। लेकिन हम यह सब राजनीति में नहीं लाते … भारत और पाकिस्तान के बीच यही अंतर है।
  • हमारा देश अक्सर आम खतरे के सामने एक ठोस चट्टान की तरह खड़ा हो गया है, और एक गहरी अंतर्निहित एकता है जो हमारी सभी प्रतीत होती विविधता के माध्यम से एक सुनहरे धागे की तरह चलती है।
  • हमें शांति से लड़ना चाहिए क्योंकि हम युद्ध में लड़े थे।
  • हमारा रास्ता सीधा और स्पष्ट है – घर में एक समाजवादी लोकतंत्र का निर्माण, सभी के लिए स्वतंत्रता और समृद्धि, और विश्व शांति और विदेश में सभी देशों के साथ मित्रता का रखरखाव।
  • हम शांति के माध्यम से सभी विवादों के निपटारे में, युद्ध के उन्मूलन में, और, विशेष रूप से, परमाणु युद्ध में शांति में विश्वास करते हैं।
  • हम एक व्यक्ति के रूप में मनुष्य की गरिमा में विश्वास करते हैं, जो भी उसकी जाति, रंग या पंथ और बेहतर, पूर्ण, और समृद्ध जीवन के लिए उसका अधिकार है।

भगत सिंह जी का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पाकिस्तान के बंगा में हुआ था। भगत सिंह जी के पिता का नाम सरदार किशन सिंह संधू था और माता का नाम विद्यावती कौर था। भगत सिंह जी एक सिक्ख थे। भगत सिंह जी की दादी ने इनका नाम भागाँवाला रखा था क्योंकि उनकी दादी जी का कहना था कि यह बच्चा बड़ा भाग्यशाली होगा। भगत सिंह एक सच्चे देशभक्त थे। न केवल उन्होंने देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी बल्कि इस घटना में अपनी जान तक दे दी। उनकी मृत्यु ने पूरे देश में उच्च देशभक्ति की भावनाएं पैदा कीं। आज भी Indian Freedom Fighters in Hindi में सबसे प्रसिद्ध भगत सिंह जी का नाम बड़े अदब और इज़्ज़त से लिया जाता है।

भगत सिंह के अनमोल विचार

  • मेरी गर्मी के कारण राख का एक एक कण चलायमान हैं में ऐसा पागल हूँ जो जेल में भी स्वतंत्र हूँ।
  • क्रांति में सदैव संघर्ष हो यह जरुरी नहीं, यह बम और पिस्तौल की राह नहीं है।
  • जो व्यक्ति उन्नति के लिए राह में खड़ा होता है उसे परम्परागत चलन की आलोचना एवम विरोध करना होगा साथ ही उसे चुनौती देनी होगी।
  • मैं यह मानता हूँ की मह्त्वकांक्षी, आशावादी एवम जीवन के प्रति उत्साही हूँ लेकिन आवश्यकता अनुसार मैं इस सबका परित्याग कर सकता हूँ यही सच्चा त्याग होगा।
  • कोई भी व्यक्ति तब ही कुछ करता है जब वह अपने कार्य के परिणाम को लेकर आश्व्स्त (औचित्य) होता है जैसे हम असेम्बली में बम फेकने पर थे।
  • कठोरता एवं आजाद सोच ये दो क्रांतिकारी होने के गुण है।
  • मैं एक इन्सान हूँ और जो भी चीजे इंसानियत पर प्रभाव डालती है मुझे उनसे फर्क पड़ता है।

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दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर, 1825 को मुम्बई के एक ग़रीब पारसी परिवार में हुआ। जब दादाभाई 4 वर्ष के थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया। उनकी माँ ने निर्धनता में भी बेटे को उच्च शिक्षा दिलाई। उच्च शिक्षा प्राप्त करके दादाभाई लंदन की यूनिवर्सिटी के कॉलेज में पढ़ाने लगे थे। 1885 में दादाभाई नौरोजी ने एओ ह्यूम द्वारा स्थापित ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह तीन बार (1886, 1893, 1906) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। Indian Freedom Fighters in Hindi में से एक दादाभाई नौरोजी का हमारी आज़ादी में बहुत बड़ा हाथ है।

दादाभाई नौरोजी की प्रमुख पुस्तकें

  • पावर्टी एंड अन ब्रिटिश रूल इन इंडिया
  • स्पीच एंड राइटिंग
  • ग्रांट ऑफ इंडिया
  • पावर्टी इन इंडिया

कांग्रेस की अध्यक्षता

यह कांग्रेस की तीन बार अध्यक्ष रहे जिनकी डिटेल निम्नलिखित है :-

  • 1886 ( कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन जो कोलकाता में हुआ)
  • 1893 ( कांग्रेस का 9 वां अधिवेशन जो लाहौर में हुआ)
  • 1906 ( कांग्रेस का 22वां अधिवेशन जो कोलकाता में हुआ इसी अधिवेशन में नौरोजी ने सर्वप्रथम स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया था)

दादाभाई नौरोजी के प्रमुख विचार

दादाभाई नौरोजी के प्रमुख विचार कुछ इस प्रकार हैं :-

  • नौरोजी गोखले की भाति उदारवादी राष्ट्रवादी थे और अंग्रेजी में न्यायप्रियता में विश्वास रखते ।
  • भारत के लिए ब्रिटिश शासन को वरदान मानते थे ।
  • स्वदेशी और बहिष्कार का सांकेतिक रूप से प्रयोग करने पर बल देते थे ।
  • उन्होंने सर्वप्रथम भारत का आर्थिक आधार पर अध्ययन किया।

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बिपिन चंद्र पाल का जन्म 7 नवंबर 1858 को वर्तमान बांग्लादेश के सिलहट जिले के पोइला गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक धनी हिंदू वैष्णव परिवार में हुआ था। उनके पिता रामचंद्र पाल एक फारसी विद्वान और एक छोटे जमींदार थे। बिपिन चंद्र पाल तीन उग्रवादी देशभक्तों में से एक के रूप में प्रसिद्ध थे। जिन्हें ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से जाना जाता था। उन्हें श्री अरबिंदो द्वारा ‘राष्ट्रवाद का सबसे शक्तिशाली पैगंबर’ कहा गया। बिपिन चन्द्र पाल एक प्रख्यात पत्रकार भी थे जिनकी ख्याति पूरे विश्व में फैली हुई थी। उन्होंने अपनी पत्रकारिता का इस्तेमाल देशभक्ति की भावना और सामाजिक जागरूकता  के प्रसारण में किया। उनकी प्रमुख पुस्तकों में स्वराज और वर्तमान स्थिति, हिंदुत्व का नूतन तात्पर्य, भारतीय राष्ट्रवाद, भारत की आत्मा, राष्ट्रीयता और साम्राज्य, सामाजिक सुधार के आधार और अध्ययन शामिल है। वे डेमोक्रेटिक, इंडिपेंडेंट और कई अन्य पत्रिकाओं और समाचारपत्रों के संपादक रहे, इसके साथ ही परिदर्शक, न्यू इंडिया जैसी पत्रिकाएं शुरू की।

बिपिन चंद्र पाल 1858 में ब्रिटिश सेना के खिलाफ सबसे बड़ी क्रांति के दौरान पैदा हुए क्रांतिकारी थे। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे और उन्होंने विदेशी वस्तुओं के परित्याग को प्रोत्साहित किया। उन्होंने लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक के साथ एक तिकड़ी बनाई, जिसे लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाता है, जहां उन्होंने कई क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया।

  • जन्म: 7 नवंबर 1858, हबीगंज जिला, बांग्लादेश
  • मृत्यु: 20 मई 1932, कोलकाता
  • शिक्षा: सेंट पॉल कैथेड्रल मिशन कॉलेज, प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय
  • प्रसिद्ध रूप से जाना जाता है: क्रांतिकारी विचारों के पिता

लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को दुधिके गॉव में हुआ था जो वर्तमान में पंजाब के मोगा जिले में स्थित है। वह मुंशी राधा किशन आज़ाद और गुलाब देवी के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनके पिता बनिया जाति के अग्रवाल थे। बचपन से ही उनकी माँ ने उनको उच्च नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी थी। लाला लाजपत राय यह एक स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ साथ एक लेखक भी थे। उन्होंने अपने कार्य और विचारों के साथ लेखन कार्य से भी लोगों का मार्गदर्शन किया। उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तके – हिस्ट्री ऑफ़ आर्य समाज, शिवाजी का चरित्र चित्रण, दयानंद सरस्वती, भगवत गीता का संदेश, युगपुरुष भगवान श्रीकृष्ण आदि हैं ।

लाला लाजपत राय पर कविता

लाला लाजपत राय उनका नाम था, भारत की आजादी के लिए उनका हर काम था, अंग्रेजी हुकूमत को मिलता करारा जवाब था, भारत की आजादी का उनके आखों में ख्वाब था. गरम उनका स्वभाव था, गरीबों के लिए प्रेम भाव था, अंग्रेज भी उनसे डरते थे, क्योंकि झुकना उनका स्वभाव न था. देश के खातिर प्राणों का बलिदान दिया, स्कूल और कॉलेज खोलकर सबको ज्ञान दिया, देश पर तन-मन-धन न्यौछावर कर डाला देशभक्तों के लहू में चिंगारी लगाकर स्वतंत्रता का वरदान दिया.

Ram Mohan Roy

राम मोहन का जन्म 22 मई 1772 को बंगाल के हूगली जिले के में राधानगर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम रामकंतो रॉय और माता का नाम तैरिनी था। राम मोहन का परिवार वैष्णव था, जो कि धर्म संबंधित मामलो में बहुत कट्टर था। उनकी शादी 9 वर्ष की उम्र में ही कर दी गई। लेकिन उनकी प्रथम पत्नी का जल्द ही देहांत हो गया। इसके बाद 10 वर्ष की उम्र में उनकी दूसरी शादी की गयी जिसे उनके 2 पुत्र हुए लेकिन 1826 में उस पत्नी का भी देहांत हो गया और इसके बाद उसकी तीसरी पत्नी भी ज्यादा समय जीवित नहीं रह सकी। 1803 में रॉय ने हिन्दू धर्म और इसमें शामिल विभिन्न मतों में अंध-विश्वासों पर अपनी राय रखी। राजा राम मोहन रॉय को मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने राजा की उपाधि दी थी। राजा राम मोहन रॉय को अनेक भाषा जैसे कि अरबी, फारसी, अंग्रेजी और हिब्रू भाषाओं का ज्ञान था। राजा राम मोहन रॉय का प्रभाव लोक प्रशासन, राजनीति, शिक्षा और धर्म के क्षेत्र में स्पष्ट था।राजा राम मोहन रॉय को सती और बाल विवाह की प्रथाओं को खत्म करने के लिए जाना जाता है। राजा राम मोहन राय को कई इतिहासकारों द्वारा “बंगाल पुनर्जागरण का पिता” भी माना जाता है। महज 15 साल की उम्र में राजा राम मोहन राय ने बंगाल में पुस्‍तक लिखकर मूर्तिपूता का विरोध शुरू किया था। राजा राम मोहन राय ने अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त कर मैथ्‍स, फिजिक्‍स, बॉटनी और फिलॉसफी जैसे विषयों को पढ़ने के साथ साथ वेदों और उपनिषदों को भी जीवन के लिए अनिवार्य बताया था।

तांतिया टोपे 1857 के विद्रोह के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों में से एक थे। 1814 में उनका जन्म हुआ, उन्होंने अपने सैनिकों को ब्रिटिश शासन के प्रभुत्व के खिलाफ लड़ने के लिए नेतृत्व किया। उन्होंने ब्रिटिश जनरल विन्धम को कानपुर छोड़ देने के लिए मजबूर कर दिया और रानी लक्ष्मीबाई को ग्वालियर बहाल करने में मदद की।

  • जन्म: 1814, येओला
  • मृत्यु: 18 अप्रैल 1859, शिवपुरी
  • पूरा नाम: रामचंद्र पांडुरंग टोपे

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बाल गंगाधर तिलक 1856 में पैदा हुए एक उल्लेखनीय स्वतंत्रता सेनानी थे। अपने उद्धरण के लिए प्रसिद्ध, ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है ‘। उन्होंने कई विद्रोही समाचार पत्र प्रकाशित किए और ब्रिटिश शासन की अवहेलना करने के लिए स्कूलों का निर्माण किया। वह लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल के साथ लाल-बाल-पाल के तीसरे सदस्य थे।

  • जन्म: 23  जुलाई 1856, चिखलीक
  • मृत्यु: 1 अगस्त 1920, मुंबई
  • लोकमान्य तिलक के नाम से प्रसिद्ध

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22 अक्टूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में जन्मे अशफाकउल्ला खान महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे ‘असहयोग आंदोलन’ के साथ बड़े हुए। जब वह एक युवा सज्जन थे, तभी अशफाकउल्ला खान राम प्रसाद बिस्मिल से परिचित हो गए। वह गोरखपुर में हुई ‘चौरी-चौरा कांड’ के मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक थे। वह स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे और चाहते थे कि अंग्रेज किसी भी कीमत पर भारत छोड़ दें। अशफाकउल्ला खान एक लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें बिस्मिल के साथ सच्ची दोस्ती के लिए जाना जाता था, उन्हें काकोरी ट्रेन डकैती के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी। इसे 1925 के काकोरी षडयंत्र के नाम से जाना जाता था।

  • जन्म: 22 अक्टूबर 1900, शाहजहांपुर
  • मृत्यु: 19 दिसंबर 1927, फैजाबाद
  • संगठन: हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
  • प्रसिद्ध रूप से जाना जाता है: अशफाक उल्ला खान

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बालाजीराव भट, जिन्हें आमतौर पर ‘नाना साहिब’ के नाम से जाना जाता है, का जन्म मई 1824 में बिठूर (कानपुर जिला), उत्तर प्रदेश में हुआ था। वह भारत के मराठा साम्राज्य के आठवें पेशवा थे। शिवाजी के शासनकाल के बाद, वह सबसे शक्तिशाली राजाओं में से एक थे और इतिहास में सबसे साहसी भारतीय स्वतंत्रता योद्धाओं में से एक थे। उनका दूसरा नाम बालाजी बाजीराव था। 1749 में जब छत्रपति शाहू की मृत्यु हुई, तो उन्होंने मराठा साम्राज्य को पेशवाओं के पास छोड़ दिया। उनके राज्य का कोई उत्तराधिकारी नहीं था, इसलिए उन्होंने वीर पेशवाओं को अपना उत्तराधिकारी नामित किया। मराठा साम्राज्य के राजा के रूप में नाना साहिब ने पुणे के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके शासन काल में पूना एक छोटे से गांव से महानगर में तब्दील हो गया था। उन्होंने नए जिलों, मंदिरों और पुलों का निर्माण करके शहर को नया रूप दिया। यह कहते हुए कि, 1857 के विद्रोह में साहिब का महत्वपूर्ण योगदान था, उत्साही विद्रोहियों के एक समूह का नेतृत्व करके उन्होंने कानपुर में ब्रिटिश सैनिकों को पछाड़ दिया। हालाँकि, नाना साहब और उनके आदमियों को हराने के बाद, अंग्रेज कानपुर को वापस लेने में सक्षम थे।

  • जन्म : 19 मई 1824, बिठूर
  • पूरा नाम: धोंडू पंतो
  • मृत्यु: 1859, नैमिशा वन
  • गायब: जुलाई 1857 को कानपुर (अब कानपुर), ब्रिटिश भारत में
  • नाना साहब के नाम से मशहूर

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सुखदेव, जिनका जन्म 1907 में हुआ था, एक बहादुर क्रांतिकारी और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के प्रमुख सदस्य थे। बिना किसी संदेह के, वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों में से एक थे। उन्होंने अपने सहयोगियों भगत सिंह और शिवराम राजगुरु के साथ मिलकर काम किया। उन पर ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। दुर्भाग्य से, 24 साल की उम्र में, उन्हें 23 मार्च, 1931 को पंजाब के हुसैनवाला (अब पाकिस्तान में) में भगत सिंह और शिवराम राजगुरु के साथ पकड़ा गया और फांसी पर लटका दिया गया।

  • जन्म: 15 मई 1907, लुधियाना
  • मृत्यु: 23 मार्च 1931, लाहौर, पाकिस्तान
  • शिक्षा: नेशनल कॉलेज ऑफ आर्ट्स, नेशनल कॉलेज, लाहौर
  • सदस्य: हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)

freedom fighter bhagat singh essay in hindi

कुंवर सिंह का जन्म अप्रैल 1777 में जगदीशपुर के महाराजा और महारानी (अब भोजपुर जिले, बिहार में) के महाराजा और जगदीसपुर की महारानी के यहाँ हुआ था। विद्रोह के अन्य प्रसिद्ध नामों के बीच उनका नाम अक्सर खो जाता है। बहरहाल, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान बहुत बड़ा था। बिहार में विद्रोह का नेतृत्व कुंवर सिंह ने किया था। 25 जुलाई, 1857 को, उन्होंने लगभग 80 वर्ष की आयु में दानापुर में तैनात सिपाहियों की कमान प्राप्त की। कुंवर सिंह ने मार्च 1858 में आजमगढ़ पर अधिकार कर लिया। (अब यूपी में)। 23 जुलाई को जगदीशपुर के पास एक सफल लड़ाई की कमान संभाली।

  • जन्म: नवंबर 1777, जगदीशपुर
  • मृत्यु: 26 अप्रैल 1858, जगदीशपुर
  • पूरा नाम: बाबू वीर कुंवर सिंह
  • वीर कुंवर सिंह के नाम से मशहूर

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एक प्रसिद्ध भारतीय स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे को आमतौर पर अंग्रेजों के खिलाफ 1857 के विद्रोह के अग्रदूत के रूप में पहचाना जाता है, जिसे भारत की स्वतंत्रता की पहली लड़ाई माना जाता है। ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (बीएनआई) रेजिमेंट में एक सैनिक के रूप में, उन्होंने सिपाही विद्रोह का नेतृत्व किया, जिसके कारण अंततः 1857 का विद्रोह हुआ। 1850 के दशक के मध्य में जब भारत में एक नई एनफील्ड राइफल लॉन्च की गई, तो व्यापार के साथ उनका सबसे बड़ा विवाद शुरू हुआ। राइफल के कारतूसों में जानवरों की चर्बी, विशेष रूप से गाय और सुअर की चर्बी के साथ चिकनाई होने की अफवाह थी। कारतूसों के उपयोग के परिणामस्वरूप, भारतीय सैनिकों ने निगम के खिलाफ विद्रोह कर दिया क्योंकि इसने उनकी धार्मिक मान्यताओं का उल्लंघन किया था। पांडे और उनके साथी सिपाहियों ने 29 मार्च, 1857 को ब्रिटिश कमांडरों के खिलाफ विद्रोह किया और उन्हें मारने का भी प्रयास किया।

  • जन्म: 19 जुलाई 1827, नागवा
  • मृत्यु: 8 अप्रैल 1857, बैरकपुर
  • व्यवसाय: सिपाही (सैनिक)
  • मौत का कारण : फाँसी लगाकर दी गई मृत्यु
  • के लिए जाना जाता है: भारतीय स्वतंत्रता सेनानी

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सी राजगोपालाचारी, 1878 में पैदा हुए, 1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होने से पहले पेशे से एक वकील थे। राजगोपालाचारी समकालीन भारतीय राजनीति में एक महान व्यक्ति थे। वह स्वतंत्रता पूर्व युग के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य और महात्मा गांधी के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने लाला लाजपत राय के असहयोग आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया था।

  • जन्म: 10 दिसंबर 1878,थोरापल्ली
  • मृत्यु:  25 दिसंबर 1972, चेन्नई
  • शिक्षा: प्रेसीडेंसी कॉलेज, बैंगलोर केंद्रीय विश्वविद्यालय (1894), बैंगलोर विश्वविद्यालय
  • सीआर के रूप में प्रसिद्ध, कृष्णागिरी के आम, राजाजी
  • पुरस्कार: भारत रत्न

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“देश हित पैदा हुये हैं देश पर मर जायेंगे मरते मरते देश को जिन्दा मगर कर जायेंगे”

“हमको पीसेगा फलक चक्की में अपनी कब तलक खाक बनकर आंख में उसकी बसर हो जायेंगे”

  • जन्म: 11 जून 1897, शाहजहांपुर
  • मृत्यु: 19 दिसंबर 1927, गोरखपुर जेल, गोरखपुर
  • मौत का कारण : फाँसी लगाकर दी गई फांसी
  • संगठन – हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

राम प्रसाद बिस्मिल सबसे उल्लेखनीय भारतीय क्रांतिकारियों में से एक थे, जिन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवाद से लड़ाई लड़ी और देश के लिए स्वतंत्रता की हवा में सांस लेना संभव बनाया, शाही ताकतों के खिलाफ संघर्ष के बाद, स्वतंत्रता की इच्छा और क्रांतिकारी भावना हर इंच में गूंजती रही। उनका शरीर और कविता। बिस्मिल, जिनका जन्म 1897 में हुआ था, सुखदेव के साथ हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के एक सम्मानित सदस्य थे। वह कुख्यात काकोरी ट्रेन डकैती में भी भागीदार थे, जिसके लिए ब्रिटिश सरकार ने इन्हें मौत की सजा दी थी।

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1906 में पैदा हुए चंद्रशेखर आजाद स्वतंत्रता आंदोलन में भगत सिंह के करीबी साथी थे। वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य भी थे और ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ सबसे बहादुर और साहसी भारतीय स्वतंत्रता सेनानी भी थे। ब्रिटिश सेना के साथ युद्ध के दौरान कई विरोधियों की हत्या करने के बाद, उसने अपनी कोल्ट पिस्तौल से खुद को गोली मार ली। उन्होंने वादा किया था कि वह कभी भी अंग्रेजों द्वारा जिंदा नहीं पकड़ा जाएंगे।

  • जन्म: 23 जुलाई 1906, भावरस
  • मृत्यु: 27 फरवरी 1931, चंद्रशेखर आजाद पार्क
  • पूरा नाम: चंद्रशेखर तिवारी
  • शिक्षा: महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ

महिला भारतीय स्वतंत्रता सैनानी

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कई महिला भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, चाहे वह स्थानीय स्तर पर देश के लिए लड़कर हो या पुरुषों के साथ मिलकर। भारत की स्वतंत्रता में महिला स्वतंत्रता सैनानियों ने भी भाग लिया जिनके बारे में नीचे बताया गया है:

  • झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई
  • मैडम भीकाजी कामा
  • कस्तूरबा गांधी
  • अरुणा आसफ अली
  • विजया लक्ष्मी पंडित
  • सावित्री बाई फुले
  • अम्मू स्वामीनाथनी
  • किट्टू रानी चेन्नम्मा
  • दुर्गा देवी

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झांसी की रानी का जन्म मणिकर्णिका 19 नवंबर 1828 वाराणसी भारत में हुआ था। इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागीरथी सप्रे था। इनके पति का नाम नरेश महाराज गंगाधर राव नायलयर और बच्चे का नाम दामोदर राव और आनंद राव था। रानी जी ने बहुत बहादुरी से युद्ध में अपना परिचय दिया था। रानी लक्ष्मीबाई ने अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर कसकर बाँधकर अंग्रेजों से युद्ध किया था।

रानी लक्ष्मीबाई के अनमोल विचार

  • शौर्य और वीरता झलकती है लक्ष्मीबाई के नाम में,प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की डोरी थी जिसके हाथ में।
  • दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी
  • बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।
  • मैं झांसी की रानी हूं, और इस धरती मां की बेटी मेरे होते हुए कोई भी फिरंगी झांसी को हाथ नहीं लगा सकता, मैं अपनी झांसी कभी नहीं दूंगी चाहे इसके लिए मुझे अपनी जान भी क्यों न देनी पड़े झांसी मेरी आन है.. शान है.. ईमान है..।
  • मुर्दों में भी जान डाल दे, उनकी ऐसी कहानी है वो कोई और नहीं झांसी की रानी हैं
  • हम लडे़ंगे ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी आज़ादी का उत्सव मना सके।
  • अपने हौसले की एक कहानी बनाना,हो सके तो खुद को झांसी की रानी बनाना।
  • हर औरत के अंदर है झाँसी की रानी  कुछ विचित्र थी उनकी कहा मातृभूमि के लिए प्राणाहुति देने को  ठानी,अंतिम सांस तक लड़ी थी वो मर्दानी।
  • रानी लक्ष्मी बाई लड़ी तो, उम्र तेईस में स्वर्ग सिधारी तन मन धन सब कुछ दे डाला, अंतरमन से कभी ना हारी।
  • मातृभूमि के लिए झांसी की रानी ने जान गवाई थी, अरि दल कांप गया रण में, जब  लक्ष्मीबाई आई थी

अंग्रेजों को देश से भगाने में बेगम हज़रत महल ने अहम भूमिका निभाई थी, जिनका जन्म अवध प्रांत के फैजाबाद जिले में सन 1820 में हुआ था। उनके बचपन का नाम मुहम्मदी खातून था। बेगम हजरत महल के बचपन का नाम मुहम्मदी खातून था। वह नवाब वाजिद अली शाह के अनुबंध के तहत पत्नियों में से एक थी। स्वतंत्रता संघर्ष में उनका सबसे बड़ा योगदान हिंदुओं और मुसलमानों को अंग्रेजों से लड़ने के लिए एक बल के रूप में एकजुट करना था। यहां तक कि उन्होंने महिलाओं को अपने घरों से बाहर निकलने और स्वतंत्रता के संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने और प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि महिलाएं दुनिया में कुछ भी कर सकती हैं, किसी भी लड़ाई को लड़ सकती हैं और विजेता के रूप में सामने आ सकती हैं।

निश्चित रूप से सरोजिनी नायडू आज की महिलाओं के लिए एक रोल मॉडल हैं। जिस जमाने में महिलाओं को घर से बाहर निकलने तक की आजादी नहीं थी, सरोजिनी नायडू घर से बाहर देश को आजाद करने के लक्ष्‍य के साथ दिन रात महिलाओं को जागरूक कर रही थीं। सरोजिनी नायडू उन चुनिंदा महिलाओं में से थीं जो बाद में INC की पहली प्रेज़िडेंट बनीं और उत्तर प्रदेश की गवर्नर के पद पर भी रहीं। वह एक कवयित्री भी थीं।

महिलाओं को शिक्षित करने के महत्‍व को उन्‍होंने जन जन में फैलाने का ज़िम्मा उठाया था। उन्‍होंने ही कहा था कि अगर आप किसी लड़के को शिक्षित करते हैं तो आप अकेले एक शख्स को शिक्षित कर रहे हैं, लेकिन अगर आप एक लड़की को शिक्षा देते हैं तो पूरे परिवार को शिक्षित कर रहे हैं। उन्‍होंने अपने समय में महिला उत्पीड़न के कई पहलू देखे थे और लड़कियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित होते देखा था। ऐसे में तमाम विरोध झेलने और अपमानित होने के बावजूद उन्‍होंने लड़कियों को मुख्‍य धारा में लाने के लिए उन्हें आधारभूत शिक्षा प्रदान करने की जिम्‍मेदारी उठाई थी।

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जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी भी देश के विकास के लिए तमाम गतिविधियों में बढ़ चढ़ कर हिस्‍सा लेती थीं। उन्होंने कई सालों तक देश की सेवा की और बाद में संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंब्ली की पहली महिला प्रेज़िडेंट भी बनीं। वे डिप्लोमेट, राजनेता के अलावा लेखिका भी थीं।

  • एक सच्चे और वीर सैनिक को सैन्य और आध्यात्मिक दोनों ही प्रशिक्षण की जरूरत होती है।- नेता जी सुभाष चन्द्र बोस
  • आराम, हराम है।-  जवाहर लाल नेहरू
  • सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा।- मोहम्मद इकबाल
  • दुश्मनों की गोलियों का हम डटकर सामना करेंगे, आज़ाद हैं, आज़ाद ही रहेंगे।- चन्द्रशेखर आज़ाद
  • भारतीय एकता का मुख्य आधार इसकी संस्कृति ही है, इसका उत्साह कभी भी नहीं टूटा और यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। भारतीय संस्कृति अक्षुण्ण है, क्योंकि भारतीय संस्कृति की धारा निरंतर बहती रहती है, और हमेशा बहती रहेगी। – मदन मोहन मालवीय
  • अब भी जिसका खून न खौला खून नहीं वो पानी है…जो ना आए देश के काम वो बेकार जवानी है।- चन्द्रशेखर आज़ाद
  • हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान। – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
  • मेरा रंग दे बसंती चोला,माय रंग दे बसंती चोला।- सुखदेव
  • मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक चोट ब्रिटिश सम्राज्य के ताबूत की कील बनेगी। – लाला लाजपत राय
  • अगर लोगों को स्वराज और सच्चा लोकतंत्र हासिल करना है , तो वे इसे कभी असत्य और हिंसा के द्धारा प्राप्त नहीं कर सकते हैं।-   लाल बहादुर शास्त्री
  • “आलसी व्यक्तियों के लिए भगवान कभी अवतार नहीं लेते, वे हमेशा मेहनती व्यक्ति के लिए ही अवतरित होते हैं , इसलिए काम करना शुरु करें।” – बाल गंगाधर तिलक
  • पहले तो वो आप पर बिल्कुल ध्यान नहीं देंगे, और फिर वो आप पर जमकर हंसेंगे, फिर वो आप से लड़ेंगे और फिर आप जीत जाएंगे। – राष्ट्रपिता, महात्मा गांधी
  • विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। – श्याम लाल गुप्ता
  • आज़ादी मिलती नहीं है बल्कि इसे छीनना पड़ता है।- सुभाष चंद्र बोस

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के 7 महानायक जिन्होंने आजादी दिलाने में मुख्य भूमिका निभाई 1. मंगल पांडे 2. भगत सिंह 3. महात्मा गांधी 4. पंडित जवाहरलाल नेहरू 5. चंद्रशेखर आजाद 6. सुभाष चंद्र बोस 7. बाल गंगाधर तिलक

देश की आजादी का बीज बोने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत थे। मंगल पांडे द्वारा 1857 में जुलाई की आजादी की मशाल से 90 साल बाद पूरा भारत रोशन हुआ और आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं। आइए जानते हैं ऐसे महान सपूत के बारे में..

अपनी वीरता व निडरता के कारण वे वीरबाला के नाम से जानी गईं। आज सबसे कम उम्र की बलिदानी कनकलता का नाम भी इतिहास के पन्नों से गायब है। बीनादास : बीनादास का जन्म 24 अगस्त 1911 को बंगाल प्रांत के कृष्णानगर गांव में हुआ था।

पारसी परिवार में आज ही के दिन जन्मीं भीकाजी भारत की आजादी से जुड़ी पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं. आज भीकाजी कामा का आज 157वां जन्मदिन है. जर्मनी के स्टुटगार्ट में हुई दूसरी ‘इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस’ में 46 साल की पारसी महिला भीकाजी कामा ने भारत का झंडा फहराया था।

1857 -59′ के दौरान हुये भारतीय विद्रोह के प्रमुख केन्द्रों: मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी और ग्वालियर को दर्शाता सन 1912 का नक्शा। विद्रोह का दमन, ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत, नियंत्रण ब्रिटिश ताज के हाथ में।

इन महान स्वतंत्रता सेनानियों में  भगत सिंह, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, डॉ.   राजेंद्र प्रसाद, लाला लाजपत राय, लाल बहादुर शास्त्री और बाल गंगाधर तिलक  शामिल हैं। इनके साथ ही कई और देशभक्त हैं जिन्होंने ब्रिटिश आधिपत्य से मुक्ति के लिए योगदान दिया।

‘ भारत छोड़ो ‘ आंदोलन को आज़ादी से पहले भारत का सबसे बड़ा आंदोलन माना जाता है। देश भर में लाखों भारतीय इस आंदोलन में कूद पड़े थे।

आशा है आपको Indian Freedom Fighters in Hindi पर हमारा यह ब्लॉग पसंद आया होगा। ऐसे ही अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन परिचय के बारे पढ़ने के लिए Leverage Edu के साथ बने रहें। 

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स्वतंत्रता सेनानियों पर निबंध 10 lines (Essay On Freedom Fighters in Hindi) 100, 200, 250, 300, 500, शब्दों मे

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Essay On Freedom Fighters in Hindi – किसी देश की स्वतंत्रता उसके नागरिकों पर निर्भर करती है। अपने देश और देशवासियों को आजाद कराने के लिए निःस्वार्थ अपने प्राणों की आहुति देने वाले व्यक्तियों की पहचान स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में की जाती है। हर देश में कुछ बहादुर दिल होते हैं जो स्वेच्छा से अपने देशवासियों के लिए अपनी जान दे देते हैं। स्वतंत्रता सेनानियों ने न केवल अपने देश के लिए लड़ाई लड़ी, बल्कि हर किसी के लिए जो चुपचाप सहते रहे, अपने परिवार और स्वतंत्रता को खो दिया, और यहां तक ​​कि अपने लिए जीने का अधिकार भी खो दिया। देश के लोग स्वतंत्रता सेनानियों को उनकी देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम के लिए सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। ये लोग ऐसे उदाहरण प्रदान करते हैं जिनके द्वारा अन्य नागरिक जीने का लक्ष्य रखते हैं।

Essay On Freedom Fighters in Hindi – सामान्य लोगों के लिए अपने प्राणों की आहुति देना बहुत बड़ी बात है लेकिन स्वतंत्रता सेनानी निःस्वार्थ भाव से अपने देश के लिए यह अकल्पनीय बलिदान बिना किसी परिणाम की परवाह किए करते हैं। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्हें जितने दर्द और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। उनके संघर्षों के लिए पूरा देश उनका सदैव ऋणी रहेगा।

स्वतंत्रता सेनानियों पर 10 पंक्तियाँ (10 Lines On Freedom Fighters in Hindi)

  • स्वतंत्रता सेनानी वे थे जिन्होंने भारत की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
  • उनके बलिदानों के कारण आज हम एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज में जी रहे हैं।
  • उनके पास भारत को एक स्वतंत्र देश के रूप में देखने और हमारे लोगों को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करने की दृष्टि थी।
  • उन्होंने हमारे देश से अंग्रेजों को भगाने के लिए एकजुट होने का फैसला किया।
  • महात्मा गांधी , भगत सिंह , सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल , आदि कुछ प्रमुख व्यक्ति हैं जिन्होंने भारत में लोगों के बीच स्वतंत्रता की आग को प्रज्वलित किया।
  • हमारे कुछ स्वतंत्रता सेनानियों की सुंदरता यह थी कि उन्होंने किसी भी हथियार का इस्तेमाल नहीं किया और विशुद्ध रूप से “अहिंसा” और असहयोग की विचारधारा पर लड़े।
  • आजादी का बीज 1857 के आसपास बोया गया था और हमें आजादी लगभग 90 साल बाद यानी 1947 में मिली।
  • आज हम जिस स्वतंत्रता का आनंद ले रहे हैं, वह उन लोगों का संघर्ष है, जिन्होंने एक स्वतंत्र देश की कल्पना की थी।
  • हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को मनाना और उनका सम्मान करना आवश्यक है।
  • हमारे स्वतंत्रता सेनानी हमारे लिए प्रेरणा के स्रोत हैं क्योंकि वे देश के लिए प्यार और देश को ब्रिटिश शासन से मुक्त करने के लिए किए गए बलिदान का मूल्य सिखाते हैं।

स्वतंत्रता सेनानियों पर 100 शब्दों का निबंध (100 Words Essay On Freedom fighters in Hindi)

अपने महान योद्धाओं के नेतृत्व में बहादुर स्वतंत्रता संग्राम के परिणामस्वरूप 15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने कई संघर्षों, आंदोलनों, लड़ाइयों और उथल-पुथल से लड़ने में योगदान दिया।

बाल गंगाधर तिलक, डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ लाल बहादुर शास्त्री, सरदार वल्लभ भाई पटेल और महात्मा गांधी जैसे उत्कृष्ट मुक्ति सेनानियों द्वारा महत्वपूर्ण योगदान दिया गया है।

स्वतंत्रता सेनानियों ने न केवल अपने देश की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी, बल्कि उन सभी के लिए भी संघर्ष किया, जिन्होंने चुपचाप सहा और अपने परिवार, स्वतंत्रता, या यहां तक ​​कि स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार खो दिया। स्वतंत्रता सेनानियों के लिए देश के लोगों के मन में बहुत सम्मान है।

स्वतंत्रता सेनानियों पर 200 शब्दों का निबंध (200 Words Essay On Freedom fighters in Hindi)

Essay On Freedom Fighters in Hindi – भारत अपनी स्वतंत्रता का श्रेय अपने बहादुर स्वतंत्रता सेनानियों को देता है। यही कारण है कि हम स्वतंत्रता दिवस मनाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं। वे क्रांतिकारी थे, और उनमें से कुछ ने अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए अहिंसा को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया। स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किए गए प्रयासों के कारण, भारत को अंततः 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

मेरे पसंदीदा स्वतंत्रता सेनानी

महात्मा गांधी, जिन्हें लोकप्रिय रूप से “राष्ट्रपिता” के रूप में जाना जाता है, वे हैं जिन्हें मैं बहुत प्यार करता हूं और मेरे पसंदीदा स्वतंत्रता सेनानियों में से एक हैं। उन्होंने अहिंसा का मार्ग चुना और केवल सत्य और शांति का उपयोग करके मुक्ति प्राप्त की, किसी हथियार का नहीं।

एक और महान स्वतंत्रता सेनानी रानी लक्ष्मी बाई थीं, जो एक मजबूत महिला थीं, जिनके पास उदाहरण के तौर पर सिखाने के लिए बहुत कुछ था। इतनी चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, उन्होंने देश के लिए लड़ाई लड़ी। माँ ने अपने बच्चे के लिए अपने देश को कभी नहीं छोड़ा; बल्कि, वह उसे अन्याय के खिलाफ युद्ध की अग्रिम पंक्ति में ले गई।

एक शताब्दी की क्रांति, रक्तपात और युद्धों के बाद, हम अंग्रेजों से अपनी आजादी वापस लेने में सक्षम हुए। हम इन उत्कृष्ट नेताओं के कारण एक लोकतांत्रिक, स्वतंत्र देश में रहते हैं। कई स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश अन्याय, शोषण और क्रूरता से लोगों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। यह देश और इसके लोगों के लिए उनका सरासर प्यार और समर्पण था कि उन्होंने भारत को अंग्रेजों से वापस ले लिया।

स्वतंत्रता सेनानियों पर 250 शब्दों का निबंध (250 Words Essay On Freedom fighters in Hindi)

स्वतंत्रता सेनानी वे लोग हैं जो अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ते हैं। उन्हें ऐसे नायकों के रूप में देखा जाता है जो अपने देश की आजादी के लिए कोई भी बलिदान देने को तैयार थे। देश की आजादी के लिए कई स्वतंत्रता सेनानियों ने लड़ाई लड़ी। कुछ उल्लेखनीय नामों में महात्मा गांधी, भगत सिंह, रानी लक्ष्मी बाई, सुभाष चंद्र बोस आदि शामिल हैं।

स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान

स्वतंत्रता सेनानी किसी देश के स्वतंत्रता संग्राम में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे ही लोगों के संघर्ष में नेतृत्व करते हैं और उन्हें साहस और दिशा प्रदान करते हैं। स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने देश की आजादी के लिए कई कुर्बानियां दी हैं। स्वतंत्रता के लिए अपने संघर्ष में उन्हें कारावास, यातना और कभी-कभी मृत्यु का भी सामना करना पड़ा। उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया कि देश स्वतंत्र है।

स्वतंत्रता सेनानियों का महत्व

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भारत के स्वतंत्रता सेनानी एक प्रमुख प्रेरक शक्ति थे। भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे राजनीतिक और अहिंसक तरीकों से लड़े, और उनके प्रयासों से अंततः भारत में ब्रिटिश शासन का अंत हुआ। भारतीय स्वतंत्रता सेनानी व्यक्तियों का एक विविध समूह थे जो शिक्षित पेशेवरों से लेकर आदिवासी नेताओं तक थे। उन सबका एक ही लक्ष्य था – भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना।

स्वतंत्रता सेनानी बहादुर आत्माएं हैं जो अपने देश की आजादी के लिए लड़ती हैं। वे महान त्याग करते हैं और खतरे का सामना करने में अपार साहस दिखाते हैं। स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत उनकी मृत्यु के बाद भी जीवित रहती है। देश के लोग उनकी बहादुरी और समर्पण के लिए उन्हें याद करते हैं और उनका सम्मान करते हैं।

स्वतंत्रता सेनानियों पर 300 शब्दों का निबंध (300 Words Essay On Freedom fighters in Hindi)

Essay On Freedom Fighters in Hindi – स्वतंत्रता सेनानी वे बहादुर और दुस्साहसी लोग थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन से अपने देश को आजादी दिलाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। उन्होंने अंतहीन बलिदान दिए ताकि हम अपने देश में आज़ादी से रह सकें और खुशहाल जीवन जी सकें। अंग्रेज भारतीयों पर शोषण के कई अन्यायपूर्ण कार्य करते थे, इसलिए ये स्वतंत्रता सेनानी वे लोग थे जो इन ब्रिटिश लोगों का विरोध करने और अपने देश की स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए उनसे लड़ने का साहस रखते थे। भारत को एक स्वतंत्र और स्वतंत्र देश बनाने के लिए उन्होंने बहुत दर्द और कष्ट सहा।

लोग हमेशा उन्हें उनकी देशभक्ति और अपने देश के लिए प्यार के लिए याद करते हैं। हम और हमारी आने वाली पीढ़ियां कभी भी उनके बलिदान और कड़ी मेहनत के लिए उन्हें पर्याप्त धन्यवाद नहीं दे सकतीं। स्वतंत्रता सेनानी वे लोग हैं जिनकी वजह से हम स्वतंत्रता दिवस मना पा रहे हैं।

अंग्रेजों की क्रूरता से लोगों को बचाने के लिए कई स्वतंत्रता सेनानी युद्ध के लिए गए। भले ही उनके पास लड़ने का कोई प्रशिक्षण नहीं था, फिर भी वे लोगों की रक्षा करने और अपने देश को अन्याय और शोषण से मुक्त करने के लिए लड़े। उनमें से कई की युद्ध के दौरान हत्या कर दी गई थी और इस प्रकार हम महसूस कर सकते हैं कि उन्होंने कितनी बहादुरी से हर परिस्थिति का सामना किया और हमें एक स्वतंत्र नागरिक बनाया।

कई स्वतंत्रता सेनानियों ने अन्य लोगों को अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया, उन्होंने कई स्वतंत्रता आंदोलनों का नेतृत्व किया और लोगों को उनके मौलिक अधिकारों और शक्ति के बारे में बताया। तो वे हमारी संप्रभुता और स्वतंत्रता के पीछे कारण हैं। स्वतंत्रता सेनानियों की एक अंतहीन सूची है जिनमें से कुछ ज्ञात हैं जबकि अन्य अज्ञात हैं जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए चुपचाप अपने प्राणों की आहुति दे दी।

महात्मा गांधी, भगत सिंह, उधम सिंह, राजगुरु, सुभाष चंद्र बोस, चंदर शेखर, सुखदेव कुछ प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन अपने देश के लिए लड़ते हुए समर्पित कर दिया।

हालाँकि, हम सांप्रदायिक घृणा को दिन-ब-दिन बढ़ते हुए देख सकते हैं जो काफी शर्मनाक है क्योंकि लोग इन स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को बेकार कर रहे हैं। इसलिए हमें एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नहीं होना चाहिए और हमेशा शांति से रहने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हम अपने राष्ट्र को सफल और समृद्ध बनाने में मदद कर सकें।

स्वतंत्रता सेनानियों पर 500 शब्दों का निबंध (500 Words Essay On Freedom fighters in Hindi)

स्वतंत्रता सेनानी वे लोग थे जिन्होंने अपने देश की आजादी के लिए निस्वार्थ रूप से अपने प्राणों की आहुति दे दी। हर देश में स्वतंत्रता सेनानियों की अपनी उचित हिस्सेदारी है। लोग उन्हें देशभक्ति और अपने देश के प्रति प्रेम के संदर्भ में देखते हैं। उन्हें देशभक्त लोगों का प्रतीक माना जाता है।

देश की तो बात ही छोड़िए, स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्रियजनों के लिए ऐसा बलिदान दिया जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। जितना दर्द, कठिनाई और विपरीत उन्होंने सहा है उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उनके बाद की पीढ़ियां उनके निःस्वार्थ बलिदान और कड़ी मेहनत के लिए हमेशा उनकी ऋणी रहेंगी।

स्वतंत्रता सेनानियों के महत्व पर पर्याप्त जोर नहीं दिया जा सकता है। आखिर उन्हीं की वजह से हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने कितनी छोटी भूमिका निभाई, वे आज भी बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे उस समय में थे। इसके अलावा, उन्होंने देश और इसके लोगों के लिए खड़े होने के लिए उपनिवेशवादियों के खिलाफ विद्रोह किया।

इसके अलावा, अधिकांश स्वतंत्रता सेनानी अपने लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए युद्ध में भी गए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके पास कोई प्रशिक्षण नहीं था; उन्होंने ऐसा अपने देश को स्वतंत्र बनाने के शुद्ध इरादे से किया। स्वतंत्रता संग्राम में अधिकांश स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राणों की आहुति दी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वतंत्रता सेनानियों ने अन्याय से लड़ने के लिए दूसरों को प्रेरित और प्रेरित किया। वे स्वतंत्रता आंदोलन के पीछे के स्तंभ हैं। उन्होंने लोगों को उनके अधिकारों और उनकी शक्ति के बारे में जागरूक किया। यह सब स्वतंत्रता सेनानियों की वजह से है कि हम किसी भी प्रकार के उपनिवेशवादियों या अन्याय से मुक्त एक स्वतंत्र देश में समृद्ध हुए।

भारत ने बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों को अपनी मातृभूमि के लिए लड़ते देखा है। जबकि मैं उनमें से हर एक का समान रूप से सम्मान करता हूं, मेरे कुछ व्यक्तिगत पसंदीदा हैं जिन्होंने मुझे अपने देश के लिए काम करने के लिए प्रेरित किया। सबसे पहले, मैं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को पूरी तरह से प्रणाम करता हूं। मैं उन्हें पसंद करता हूं क्योंकि उन्होंने अहिंसा का मार्ग चुना और बिना किसी हथियार के, केवल सत्य और शांति के बिना आजादी हासिल की।

दूसरे, रानी लक्ष्मी बाई एक महान स्वतंत्रता सेनानी थीं। मैंने इस सशक्त महिला से बहुत कुछ सीखा है। इतनी कठिनाइयों के बावजूद वह देश के लिए लड़ीं। एक मां ने अपने बच्चे के लिए कभी देश नहीं छोड़ा, बल्कि अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए उसे जंग के मैदान में ले गई। इसके अलावा, वह कई मायनों में इतनी प्रेरणादायक थी।

इसके बाद मेरी लिस्ट में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम आता है। उन्होंने अंग्रेजों को भारत की शक्ति दिखाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय सेना का नेतृत्व किया। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति ‘तुम मुझे खून दो और मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’

अंत में, पंडित जवाहरलाल नेहरू भी महानतम नेताओं में से एक थे। एक समृद्ध परिवार से होने के बावजूद, उन्होंने आसान जीवन छोड़ दिया और भारत की आजादी के लिए संघर्ष किया। उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा लेकिन वह उन्हें अन्याय के खिलाफ लड़ने से नहीं रोक पाए। वह कई लोगों के लिए एक महान प्रेरणा थे।

संक्षेप में, स्वतंत्रता सेनानियों ने ही हमारे देश को वह बनाया जो आज है। हालाँकि, हम आजकल देखते हैं कि लोग हर उस चीज़ के लिए लड़ रहे हैं जिसके खिलाफ वे खड़े थे। सांप्रदायिक घृणा को बीच में नहीं आने देने के लिए हमें एक साथ आना चाहिए और इन स्वतंत्रता सेनानियों के भारतीय सपने को पूरा करना चाहिए। तभी हम उनके बलिदान और स्मृति का सम्मान करेंगे।

स्वतंत्रता सेनानियों पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q.1 स्वतंत्रता सेनानी क्यों महत्वपूर्ण थे.

A.1 स्वतंत्रता सेनानियों ने हमारे देश को स्वतंत्र कराया। उन्होंने अपने जीवन का त्याग कर दिया ताकि हम उपनिवेशवाद से मुक्त उज्ज्वल भविष्य प्राप्त कर सकें।

Q.2 कुछ भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के नाम बताइए।

A.2 भारत के कुछ प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी महात्मा गांधी, रानी लक्ष्मी बाई, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू थे।

स्वतंत्रता सेनानियों पर निबंध (Freedom Fighters Essay In Hindi)

भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों पर निबंध (Indian Freedom Fighters Essay In Hindi)

आज   हम स्वतंत्रता सेनानियों पर निबंध (Essay On Freedom Fighters In Hindi) लिखेंगे। स्वतंत्रता सेनानियों पर लिखा यह निबंध बच्चो (kids) और class 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है।

स्वतंत्रता सेनानियों पर लिखा हुआ यह निबंध (Essay On Freedom Fighters In Hindi) आप अपने स्कूल या फिर कॉलेज प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल कर सकते है। आपको हमारे इस वेबसाइट पर और भी कई विषयो पर हिंदी में निबंध मिलेंगे , जिन्हे आप पढ़ सकते है।

भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों पर निबंध (Indian Freedom Fighters Essay In Hindi)

स्वतंत्रता सेनानी जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों तक की बलि दे दी, उनको अपने देश से प्रेम था। उन्होंने अपने घर परिवार की चिंता करे बगैर अपना सब कुछ देश को आजाद कराने में न्योछावर कर दिया। न जाने कितने स्वतंत्रता सेनानियो ने देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। क्युकी देशभक्ति इनमे कूट कूट कर भरी थी।

देश को आजाद कराने के लिए जो महान बलिदान स्वतंत्रता सेनानियों ने दिया, उसकी कल्पना किए जाने से हमारी रूह कांप जाती है। वे न जाने कितने दर्द और कठिनाइयों से गुजरे होगे। उनके लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप आज हमारे देश में शांति स्थापित की जा सकी है।

इनके दिए गए बलिदान को हम कभीं नही चुका सकते है। देश गुलामी की जंजीर से इस कदर जकड़ा हुआ था, कि बिना कारण के भी बेकसूर लोगो को जेल में डाल दिया जाता था। कुछ समय के लिए सोच कर देखिए, अगर आपके साथ कुछ ऐसा घटित होता तो कैसा लगता।

स्वतंत्रता सेनानियों का देश को आजादी दिलाने में महत्व

स्वतंत्रता सेनानियो के महत्त्व को बताने की आवश्यकता मुझे बिल्कुल नही लगती है। क्योंकि इनका नाम इतिहास के पन्नो पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया गया है। देश को आजाद कराने में इनके दिए गए योगदान को याद करने के लिए हम स्वतंत्रता दिवस मनाते है।

खैर इस बात का कोई महत्त्व नहीं होता कि उन्होंने कितना बड़ा योगदान दिया, फर्क इस बात से पड़ता है कि इनकी कुछ सहभागिता थी देश को स्वतंत्र कराने के लिए। इससे फर्क पड़ता है की देशभक्ति की भावना उनके अंदर किस कदर मौजूद थी।

स्वतंत्रता सेनानियो के जीवन में अपार संघर्ष था, उन्हें कई बार देश को आजाद कराने के लिए युद्ध करने पड़े और कईयों ने तो अपनी जान भी गवां दी। युद्ध में लड़ने के लिए इनको किसी भी प्रकार का प्रशिक्षण भी नही दिया गया था, फिर भी अपने प्राणों की चिंता करे बगैर वे युद्ध में हिस्सा लेते थे और बड़ी वीरता पूर्वक शत्रु का समाना करते थे।

देश को आजाद कराने के लिए इनके मन में एक जूनून था, जोकि देश को आजाद करा कर ही पूरा हुआ। स्वतंत्रता सेनानि दूसरो के सामने मिसाल कायम करने में सफल रहे, कि हमे विषम से विषम परिस्थिति में हार नही माननी चाहिए, बल्कि डट कर उसका सामना करना चाहिए।

यही वजह है कि अंग्रेजो को भारत के स्वतंत्रता सेनानियो के सामने अंत में घुटने टेकने पड़े। स्वतंत्रता सेनानियों के कठोर परिश्रम के परिणामस्वरूप आज हम किसी भी प्रकार के उपनिवेशवादियों या उनके अत्याचार से पूरी तरह से आजाद हो सके है। आज हमारा देश उन्नति की राह पर अग्रसर है।

मेरे प्रिय स्वतंत्रता सेनानियों की सूची

भारत को आजाद कराने में वैसे तो बहुत सारे स्वतंत्रता सेनानियों का हाथ रहा है। उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए तन मन और धन सबकुछ न्योछावर कर दिया था। उनके दिए गए त्याग को कोई चुका नही सकता।

उन्ही स्वतंत्रता सेनानियों में कुछ स्वतंत्रता सेनानियो को मैं बहुत पसंद करता हूं। इन्ही से प्रेरित होकर मेरे अंदर देशभक्ति की भावना जागृत हुई है। जिनकी सूचि निचे दी है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी है, जिन्होने बगैर हिंसा के देश को आजाद कराने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। सत्य और अहिंसा के बल पर उन्होंने देश को आजाद कराया।

रानी लक्ष्मी बाई

मेरे प्रिय सेनानी का जिक्र करे तो, उसमे रानी लक्ष्मी बाई आती है। इनका नाम भी इतिहास के पन्नो पर वीरता के लिए दर्ज किया गया है। इस वीरांगना को पसंद किए जाने के पीछे मेरी अहम वजह यह है की इन्होंने कठिन से कठिन परिस्थिति में अंग्रेजो के सामने हार नही मानी और अंतिम समय तक डट कर उनका सामना करती रही।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस

इसके बाद अगली बारी आती है, हमारे सबके चहेते नेताजी सुभाष चंद्र बोस की। देश को आजाद कराने में इनका भी भरपूर सहयोग रहा है। इन्होंने अंग्रेजो को भारत की शक्ति का प्रदर्शित करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय सेना का नेतृत्व किया।

देश को आजाद कराने के लिए इन्होंने लोगो को जागृत किया और उनसे कुरबानी मांगी। इसका अंदाजा आप उनकी दी गई पंक्तियों से लगा सकते हो। जो है “‘तुम मुझे अपना खून दो और मैं तुम्हें आजादी दूंगा”।

पंडित जवाहरलाल नेहरू

अंत में एक और महान नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू के व्यक्तिव से मै काफी प्रभावित हूं। जिन्होंने देश के लिए जीवन पर्यंत बलिदान दिया, तब जाकर हम स्वतंत्र होकर चैन से जी रहे है। एक धनी परिवार से संबंध रखने के बावजूद इन्होंने अपनी सारी सुख सुविधाओं का त्याग करके आजादी के लिए संघर्ष किया।

इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हार नही मानी और अन्याय के खिलाफ लड़ते रहे। यही वजह है की लोग उन्हें आज भी याद करते है और उनकी दी गई कुरबानी की कहानी युवा पीढ़ी को आज भी सुनाते है।

इनके अलावा भी बहोत से स्वतंत्रता सेनानी है, जिनके योगदान के बिना देश को स्वतंत्र नहीं किया जा सकता था। जैसे भगत सिंह, मंगल पांडे, चंद्र शेखर आज़ाद, कुनव सिंह, विनायक दामोदर सावरकर, दादाभाई नौरोजी, सरदार वल्लभभाई पटेल, लाला लाजपत राय, राम प्रसाद बिस्मिल, बाल गंगाधर तिलक, लाल बहादुर शास्त्री, नाना साहब, राजा राम मोहन रॉय।

भारत को आजाद कराने में स्वतंत्रता सेनानियों का महत्त्वपूर्ण हाथ था। इनके द्वारा दी गई कुरबानी को हम कभी नहीं भुला पाएंगे। भारत के इतिहास के पन्नो के खुलने पर आपको पता चलेगा कि इन्होंने कितना बड़ा त्याग किया। देश को आजाद कराने के लिए कितनी लंबी और भयानक लड़ाई लड़ी। तब जाकर कही देश स्वतंत्र हो सका।

एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमे इनसे प्रेरित होना चाहिए। इनके समान देशभक्ति हर देशवासी के मन में होनी चाहिए। पूरे देश के लोगो को एकता के सूत्र में बांधना चाहिए। ताकि जब कभी हमारे देश पर कोई मुसीबत आए, तो हम शत्रु का डटकर सामना कर सके।

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तो यह था स्वतंत्रता सेनानियों  पर निबंध (Freedom Fighters Essay In Hindi) , आशा करता हूं कि स्वतंत्रता सेनानियों पर हिंदी में लिखा निबंध (Hindi Essay On Freedom Fighters) आपको पसंद आया होगा। अगर आपको यह लेख अच्छा लगा है , तो इस लेख को सभी के साथ शेयर करे।

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